
जानिए कौन थे जसवंत सिंह खालरा, जिनकी बायोपिक ‘सतलुज’ को लेकर छिड़ा है महासंग्राम
पंजाबी सुपरस्टार दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ (पूर्व नाम ‘पंजाब ’95’) इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। फिल्म की रिलीज, सेंसर बोर्ड से जुड़े विवाद और बाद में भारत में OTT प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद एक बार फिर उस शख्स का नाम सुर्खियों में आ गया है, जिनकी जिंदगी पर यह फिल्म आधारित है। वह शख्स हैं मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा, जिन्होंने 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के मामलों को उजागर करने का अभियान चलाया था। उनकी कहानी आज भी साहस, संघर्ष और न्याय की लड़ाई का प्रतीक मानी जाती है।
जसवंत सिंह खालरा का जन्म 2 नवंबर 1952 को पंजाब के तरनतारन जिले के खालरा गांव में हुआ था। पेशे से वे बैंक अधिकारी थे, लेकिन समय के साथ उन्होंने मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया। पंजाब में उग्रवाद और आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौर में बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की घटनाओं ने उनका ध्यान खींचा। उन्होंने सरकारी रिकॉर्ड और श्मशान घाटों के दस्तावेजों का अध्ययन कर ऐसे मामलों की जानकारी जुटाई, जिनमें कई अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार किया गया था। उनके शोध ने इस विषय पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा को जन्म दिया।
खालरा ने दावा किया था कि हजारों लोगों के कथित तौर पर अवैध रूप से अंतिम संस्कार किए गए और इन मामलों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनके द्वारा जुटाए गए दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर बाद में कई जांच एजेंसियों और न्यायिक संस्थानों ने भी इन मामलों की पड़ताल की। उनके काम को मानवाधिकार संगठनों ने महत्वपूर्ण बताया और इसे न्याय की दिशा में एक बड़ी पहल माना।
सितंबर 1995 में जसवंत सिंह खालरा का अपहरण कर लिया गया। बाद में उनकी हत्या कर दिए जाने का मामला सामने आया। इस प्रकरण की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने की और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के चर्चित मामलों में गिना जाता है और मानवाधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण मुकदमों में इसकी चर्चा होती रही है।
निर्देशक हनी त्रेहान ने इसी वास्तविक जीवन की कहानी से प्रेरित होकर फिल्म बनाई, जिसमें दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा का किरदार निभाया है। फिल्म का नाम पहले ‘घल्लूघारा’, फिर ‘पंजाब ’95’ रखा गया और अंततः ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। फिल्म को सेंसर प्रमाणन के दौरान कई आपत्तियों और कथित तौर पर 120 से अधिक कट्स की मांग का सामना करना पड़ा, जिसके कारण इसकी रिलीज वर्षों तक टलती रही। हाल ही में OTT पर रिलीज होने के कुछ समय बाद ही इसे भारत में हटा लिया गया, जिससे विवाद और गहरा गया।
‘सतलुज’ को लेकर छिड़ा विवाद केवल एक फिल्म का विवाद नहीं माना जा रहा, बल्कि यह इतिहास, मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फिल्म सेंसरशिप जैसे व्यापक मुद्दों से भी जुड़ गया है। यही वजह है कि जसवंत सिंह खालरा का नाम एक बार फिर देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग उनके जीवन, संघर्ष और न्याय के लिए किए गए प्रयासों के बारे में जानने में रुचि दिखा रहे हैं।

