50 साल तक ट्रेनों में नहीं थे टॉयलेट, एक यात्री के मजेदार खत ने बदल दी रेलवे की सोच

50 साल तक ट्रेनों में नहीं थे टॉयलेट, एक यात्री के मजेदार खत ने बदल दी रेलवे की सोच

नई दिल्ली। आज भारतीय रेलवे की लंबी दूरी की लगभग हर ट्रेन में टॉयलेट की सुविधा मौजूद है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रेलवे की शुरुआत के करीब 50 साल तक ट्रेनों में शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं थी? यह सुविधा किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि एक आम यात्री के मजेदार लेकिन प्रभावशाली पत्र के बाद शुरू हुई थी।

50 साल तक क्यों नहीं थे टॉयलेट?

भारत में पहली यात्री ट्रेन 1853 में मुंबई (तब बंबई) से ठाणे के बीच चली थी। उस दौर में ट्रेनों की यात्रा अपेक्षाकृत छोटी होती थी और ब्रिटिश प्रशासन को यह नहीं लगता था कि डिब्बों में शौचालय की जरूरत है। लेकिन जैसे-जैसे लंबी दूरी की रेल सेवाएं शुरू हुईं, यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।

एक यात्री के खत ने बदल दी व्यवस्था

कहानी ओखिल चंद्र सेन (Okhil Chandra Sen) नाम के एक यात्री से जुड़ी है। वर्ष 1909 में वे ट्रेन से सफर कर रहे थे। उन्हें शौचालय जाने की जरूरत महसूस हुई, लेकिन ट्रेन में टॉयलेट नहीं था। जब ट्रेन अहमदपुर स्टेशन पर रुकी, तो वे नीचे उतर गए। इसी बीच ट्रेन चल पड़ी और वे पीछे छूट गए।

इस घटना से नाराज होकर उन्होंने रेलवे प्रशासन को एक मजेदार शिकायत पत्र लिखा। अपने पत्र में उन्होंने लिखा कि उन्हें शौच के लिए उतरना पड़ा, ट्रेन छूट गई और उन्हें अपनी शादी तक में देर हो गई। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में रेलवे से ऐसी परेशानी दोबारा न होने देने की अपील की।

रेलवे ने माना सुझाव

बताया जाता है कि इस पत्र ने रेलवे अधिकारियों का ध्यान यात्रियों की वास्तविक समस्या की ओर खींचा। इसके बाद भारतीय रेलवे ने धीरे-धीरे यात्री डिब्बों में शौचालय की सुविधा शुरू करने का फैसला किया। बाद के वर्षों में लंबी दूरी की अधिकांश ट्रेनों में टॉयलेट अनिवार्य सुविधा बन गए।

आज काफी बदल चुकी है व्यवस्था

आज भारतीय रेलवे पारंपरिक शौचालयों से आगे बढ़कर बायो-टॉयलेट, बेहतर स्वच्छता और आधुनिक सुविधाओं वाले कोचों का इस्तेमाल कर रही है। इसका उद्देश्य यात्रियों को सुरक्षित, स्वच्छ और सुविधाजनक यात्रा उपलब्ध कराना है।

हालांकि, इतिहासकारों का मानना है कि ओखिल चंद्र सेन के पत्र के बाद भी पूरे रेलवे नेटवर्क में टॉयलेट की सुविधा लागू होने में समय लगा। फिर भी उनका पत्र भारतीय रेलवे के इतिहास में एक दिलचस्प और यादगार घटना के रूप में आज भी चर्चा में रहता है।

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