
उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, शादी से इनकार या ब्रेकअप ‘आत्महत्या के लिए उकसाना’ नहीं
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल शादी से इनकार करना या प्रेम संबंध समाप्त कर देना (ब्रेकअप) अपने आप में भारतीय न्याय संहिता (या पूर्व प्रावधानों के अनुसार भारतीय दंड संहिता की धारा 306) के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष रूप से उकसाया, दबाव बनाया या ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं, जिनके कारण पीड़ित ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी रिश्ते का टूटना या शादी के प्रस्ताव को अस्वीकार करना व्यक्तिगत निर्णय का हिस्सा है। यदि हर ब्रेकअप या शादी से इनकार को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला मान लिया जाए, तो यह कानून की मंशा के अनुरूप नहीं होगा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तभी बनता है, जब आरोपी के खिलाफ स्पष्ट और ठोस साक्ष्य हों कि उसने जानबूझकर आत्महत्या के लिए उकसाया, लगातार मानसिक प्रताड़ना दी या ऐसा व्यवहार किया जिससे पीड़ित को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। केवल भावनात्मक विवाद, रिश्ते का खत्म होना या विवाह से इनकार इस अपराध की श्रेणी में स्वतः नहीं आता।
इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने संबंधित मामले में दर्ज एफआईआर और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए आरोपी को राहत प्रदान की। अदालत ने कहा कि कानून का इस्तेमाल केवल भावनात्मक आरोपों के आधार पर नहीं किया जा सकता और आपराधिक मामलों में पर्याप्त कानूनी आधार होना आवश्यक है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। अदालत के इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश गया है कि आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे गंभीर अपराध में अभियोजन को ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे, केवल रिश्ता टूटने या शादी से इनकार करने के आधार पर किसी व्यक्ति को आरोपी नहीं ठहराया जा सकता।

