
‘सोनम वांगचुक की पत्नी क्या, खुद राष्ट्रपति भी…’ वंदे मातरम पर बोले मौलाना साजिद रशीदी
नई दिल्ली। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर देश में जारी बहस के बीच ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी का बयान सामने आया है। उन्होंने सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वंदे मातरम को लेकर उनकी आपत्ति हिंदुओं की आस्था पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि अपनी धार्मिक मान्यता से जुड़ा विषय है।
गीतांजलि आंग्मो ने क्या कहा था?
दरअसल, सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने वंदे मातरम को लेकर कहा था कि इसके जरिए भारत माता को नमन किया जाता है। उन्होंने देश को मां के रूप में देखने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए और लोगों को बड़े दिल के साथ इसे अपनाना चाहिए। उनके इसी बयान पर मौलाना साजिद रशीदी ने अपनी प्रतिक्रिया दी।
‘हम भारत की वंदना नहीं कर सकते’
मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और उसी के सामने सजदा करता है। उनके मुताबिक, दूसरे धर्मों की आस्था का वह सम्मान करते हैं, लेकिन भारत को माता मानकर उसकी वंदना करना उनकी धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं है।
उन्होंने वंदे मातरम की तुलना गजल के इश्किया अशआर से किए जाने को भी गलत बताया। रशीदी का कहना है कि गजल और देवी-देवताओं की वंदना को एक समान नहीं माना जा सकता।
‘राष्ट्रपति भी कहें तो नहीं गाएंगे’
अपने बयान में मौलाना साजिद रशीदी ने कहा कि यदि देश की राष्ट्रपति भी मुसलमानों से वंदे मातरम गाने के लिए कहें, तब भी वह इसे नहीं गाएंगे। उन्होंने इसे अपनी धार्मिक आस्था के विरुद्ध बताया और कहा कि उनके अनुसार संविधान व्यक्ति को अपनी आस्था के खिलाफ किसी चीज को मानने या न मानने की स्वतंत्रता देता है।
पहले भी वंदे मातरम पर मुखर रहे हैं रशीदी
वंदे मातरम को लेकर मौलाना साजिद रशीदी पहले भी सार्वजनिक रूप से अपना विरोध जता चुके हैं। जुलाई 2026 में उन्होंने प्रस्तावित वंदे मातरम बिल की आलोचना करते हुए इसे मुसलमानों के खिलाफ बताया था। वहीं इस मुद्दे पर मुस्लिम समाज के भीतर भी अलग-अलग राय सामने आई हैं।
देशभक्ति और धार्मिक आस्था पर बहस
वंदे मातरम को लेकर मौजूदा बहस में एक तरफ इसे राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया जा रहा है, जबकि दूसरी तरफ कुछ मुस्लिम धर्मगुरु इसके कुछ धार्मिक भावों को अपनी आस्था के अनुरूप नहीं मानते। ऐसे में मौलाना रशीदी का ताजा बयान इस बहस को एक बार फिर चर्चा में ले आया है।
फिलहाल, रशीदी ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि उनका विरोध दूसरे समुदाय की आस्था से नहीं, बल्कि अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर वंदे मातरम गाने से है।

