
Explainer: कब कोई वकील सीधे बन सकता है सुप्रीम कोर्ट का जज? जानिए क्या कहता है संविधान
नई दिल्ली। भारत के न्यायिक इतिहास में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है जब किसी वरिष्ठ वकील (एडवोकेट) को सीधे सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया जाए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने चार हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के साथ एक वरिष्ठ अधिवक्ता के नाम की भी सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में सिफारिश की है। इसके बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि आखिर कोई वकील सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज कैसे बन सकता है?
भारत के संविधान में इस व्यवस्था का प्रावधान मौजूद है। हालांकि व्यवहारिक तौर पर अधिकांश नियुक्तियां हाईकोर्ट के न्यायाधीशों या मुख्य न्यायाधीशों में से ही की जाती हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक बहुत कम वरिष्ठ अधिवक्ताओं को सीधे सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनने का अवसर मिला है।
क्या कहता है संविधान?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(3) के अनुसार कोई व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए पात्र है यदि—
- वह भारत का नागरिक हो।
- उसने किसी एक या एक से अधिक हाईकोर्ट में लगातार कम से कम 10 वर्ष तक न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो।
- या किसी एक या एक से अधिक हाईकोर्ट में लगातार कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता (Advocate) के रूप में प्रैक्टिस की हो।
- या राष्ट्रपति की राय में वह एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता (Distinguished Jurist) हो।
यानी संविधान केवल जजों को ही नहीं, बल्कि अनुभवी और प्रतिष्ठित वकीलों को भी सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनने का अवसर देता है।
कैसे होती है नियुक्ति?
सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से होती है। कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
कॉलेजियम योग्य उम्मीदवारों के नामों पर विचार करता है और सिफारिश केंद्र सरकार को भेजता है। सरकार आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद राष्ट्रपति के माध्यम से नियुक्ति की अधिसूचना जारी करती है।
सीधे वकील को जज बनाने की परंपरा क्यों दुर्लभ?
हालांकि संविधान इसकी अनुमति देता है, लेकिन अधिकांश मामलों में हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि उनके पास न्यायिक फैसले देने का लंबा अनुभव होता है।
वहीं, किसी वरिष्ठ अधिवक्ता को सीधे सुप्रीम कोर्ट जज बनाने के लिए उसके कानूनी ज्ञान, संवैधानिक मामलों में विशेषज्ञता, पेशेवर प्रतिष्ठा और लंबे अनुभव को विशेष रूप से देखा जाता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह नियुक्ति?
विशेषज्ञों का मानना है कि बार (वकालत) से सीधे न्यायपालिका में आने वाले लोग अदालत के कामकाज, संवैधानिक व्याख्याओं और जमीनी कानूनी चुनौतियों का अलग अनुभव लेकर आते हैं। इससे सर्वोच्च न्यायालय में विविध दृष्टिकोणों का समावेश होता है।
यही कारण है कि संविधान ने न्यायिक सेवा के साथ-साथ अनुभवी अधिवक्ताओं के लिए भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने का रास्ता खुला रखा है, भले ही ऐसे उदाहरण भारतीय न्यायिक इतिहास में बेहद कम देखने को मिले हों।

