
दिल्ली की खामोशी पर सवाल: हादसे होते रहे, लेकिन नहीं जागी व्यवस्था
देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर बड़े हादसे के बाद सवालों के घेरे में है। साकेत में हुए दर्दनाक हादसे ने लोगों को झकझोर दिया है, लेकिन यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछले चार वर्षों में दिल्ली में कई ऐसे हादसे हुए, जिन्होंने दर्जनों परिवारों की खुशियां छीन लीं और पूरे शहर को सदमे में डाल दिया। हर घटना के बाद जांच, कार्रवाई और सुधार के वादे किए गए, लेकिन हालात में अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आया।
इन वर्षों में आग लगने, इमारत गिरने, सड़क दुर्घटनाओं और सुरक्षा चूक से जुड़े कई बड़े हादसे सामने आए। हर बार लोगों ने सवाल उठाए कि आखिर जिम्मेदार कौन है और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे। हादसों में जान गंवाने वालों के परिजनों की चीखें और इंसाफ की मांग समय के साथ सुर्खियों से गायब होती गईं, जबकि समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहीं। इससे प्रशासनिक तैयारियों और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं।
साकेत की घटना ने एक बार फिर याद दिला दिया है कि केवल संवेदना व्यक्त करने से हालात नहीं बदलेंगे। जरूरत इस बात की है कि सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराया जाए, जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस एवं स्थायी कदम उठाए जाएं। वरना हादसे होते रहेंगे, लोग जान गंवाते रहेंगे और व्यवस्था पर उठते सवाल भी कभी खत्म नहीं होंगे।

