हेल्पएज इंडिया का नकाब उतर गया – एक मां की चीख और 400 करोड़ का धंधा

हेल्पएज इंडिया का नकाब उतर गया – एक मां की चीख और 400 करोड़ का धंधा

26 राज्यों में ऑफिस, AC में बैठे अफसर, मोटी तनख्वाह। बुजुर्गों के नाम पर हर साल 200-400 करोड़ का चंदा। नाम है हेल्पएज इंडिया। काम क्या है? सुनिए, रूह कांप जाएगी।

23 अप्रैल 2026: इंदिरा नगर मीना मार्केट के फुटपाथ पर एक मां पड़ी थी – तारा देवी कनौजिया। 70 साल की उम्र, कांपता बदन, आंखों में आंसू। बेटा दिल्ली से लाकर कूड़े की तरह फेंक गया।

लोगों का दिल पसीजा। फोन घुमाया हेल्पएज इंडिया को। बड़े एहसान से आए, उठाकर सरोजिनी नगर वृद्धाश्रम में फेंक दिया। आश्रम के व्यवस्थापक बोले “जगह नहीं है, हेरिटेज इंडिया के बहुत अनुरोध करने पर की कुछ दिन रख लो”। सरोजिनी नगर वृद्ध आश्रम ने एलजी इंडिया की कर्मचारी रश्मि मिश्रा को कहा इनको आश्रम की नहीं इलाज की जरूरत है लेकिन हेल्पज इंडिया नाम रखने से किसी की हेल्प तो करते नहीं है यह जबरदस्ती जीत करके सरोजिनी नगर आश्रम में तीन दिन के लिए इनका स्थान दिल दिया और उसके बाद कोई पूछताछ भी नहीं ली जैसे लगता है इनके सर से बर्डन उतर गया कुछ दिन क्या होते हैं? दो रोटी का टुकड़ा फेंककर फर्ज पूरा? सरोजिनी नगर आश्रम में स्थान फुल होने के कारण हेल्पर इंडिया से कहा गया कि यह अपने 3 दिन के लिए रखी गई माता को 20 दिन बाद यहां से लेकर चली जाए

फिर आया असली खेल। हेल्पएज की रश्मि मिश्रा मैडम आईं। मां को ले गईं सफेदाबाद बाराबंकी के मातृ-पितृ सदन। वहां मैनेजर कमलेश ने दरवाजा दिखा दिया – “इतनी बीमार बुढ़िया हम नहीं रख सकते”।

कमलेश जी इंसान हैं। उन्होंने कहा “दीपक महाजन को फोन करो, वो हमारे आश्रम के कई लोगों का इलाज करवा चुके हैं है वह इन माता जी का, इलाज करा देगा”। रश्मि मिश्रा जी मुझे जानती हैं। इन्होंने मुझे फोन पर बात की मैंने कहा कल मैं बजरंगबली की कृपा से सिविल श्यामा प्रसाद मुखर्जी हॉस्पिटल में इलाज करवा दूंगा

सुबह मैंने अपने दीपंकर घोष को कहा कि वह माताजी को ऑटो से ले आए । थ्री-व्हीलर में लादकर लखनऊ लाए। पॉलिटेक्निक चौराहे पर जब मैंने उस मां को देखा – हड्डियों का ढांचा, सांस उखड़ी हुई। मैंने अपने हाथों से, हां अपने हाथों से थ्री व्हीलर से उठाकर कार में लिटाया। कलेजा फट गया।

सिविल अस्पताल लखनऊ में डॉक्टर के होश उड़ गए। नस सूख चुकी थी, BP 107/43 – मौत के मुंह में थी मां। तुरंत ऑक्सीजन, इंजेक्शन, भर्ती। सुबह 10:30 से 3:30 तक मैं खड़ा रहा। एक-एक पर्ची, एक-एक दवाई दिलाई गई हर जगह अपने हाथों से उठा कर ले जाया गया

फिर अस्पताल प्रशासन ने कहा “साथ में कोई रुकेगा”। मैंने दीपंकर घोष जी को कहा – मना कर दिया। सफेदाबाद आश्रम में फोन घुमाए – सबने हाथ खड़े कर दिए। शाम को मातृ पितृ सदन सफेदाबाद के मैनेजर कमलेश जी आए, डॉक्टर बोले “4-5 दिन रुकना पड़ेगा”।

कमलेश जी ने इंसानियत दिखाते हुए हेल्पएज इंडिया की रश्मि मिश्रा को फोन लगाया: “मैडम, यहां कोई कर्मचारी भेज दो, मां अकेली है”।

और हेल्पएज इंडिया ने क्या कहा? सुनकर खून खौल जाएगा:
“उस बुढ़िया को लावारिस घोषित करके भर्ती कर दो। हमारा काम खत्म।”

लावारिस? लावारिस?
400 करोड़ डकारने वाली संस्था Helpage India के मुंह से ये लफ्ज़?
जिस मां ने 9 महीने कोख में रखा, वो लावारिस?
जिसके नाम पर तुम करोड़ों का चंदा खाते हो, वो लावारिस?

शर्म करो हेल्पएज इंडिया। शर्म करो।

ऑफिस में बैठकर बुजुर्गों की फोटो लगाकर डोनेशन मांगते हो। घर-घर लड़कियां भेजते हो – “अंकल 5000 दे दो, दादा दादी की सेवा करते हैं”। साल में एक बार स्टेज सजाकर वृद्ध दिवस मनाते हो, वो भी कंपनियों से भीख मांगकर। उसमें भी कमीशन खाते हो।

लेकिन जब एक मां मर रही थी, जब 4 दिन अस्पताल में बैठना था, तो तुम्हारा जमीर मर गया?
तुम्हारे पास एक चौकीदार नहीं है जो एक मां के सिरहाने बैठ सके?
इलाज, दवाई, भर्ती, एंबुलेंस – सब प्रभु हनुमान ने मेरे माध्यम से कर दिया। तुमसे सिर्फ एक इंसान मांगा था। एक इंसान।

नहीं दे पाए। क्योंकि तुम्हारे लिए बुजुर्ग ATM मशीन हैं। जब तक चंदा आता है, तब तक “दादी-दादी”। जब खर्च करना पड़े, तो “लावारिस”।

लखनऊ के बुजुर्गों, आंख खोलो।
ये सेवा नहीं, मेवा है। ये NGO नहीं, धंधा है।
तुम्हारी फोटो दिखाकर ये करोड़पति बन रहे हैं, और तुम मरने के लिए फुटपाथ पर पड़े हो।

मैं दीपक महाजन, दिव्य सेवा फाउंडेशन।
मेरे पास AC ऑफिस नहीं है, करोड़ों का चंदा नहीं है। कोई NGO नहीं है दिव्य सेवा फाउंडेशन
लेकिन मेरे पास कलेजा है।
मैं किसी मां को लावारिस नहीं कहता। मैं उसे “मां” कहता हूं। दिव्य सेवा फाउंडेशन बजरंगबली का दरबार है जो 24 घंटे लोगों की वास्तविक सच्ची सेवा के लिए खुला है

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