सत्ता के लिए भाई ने भाई को दिया धोखा, उद्धव के दुश्मन संग राज ने मिलाया हाथ, UBT नाराज, टूटेगा भाईचारा?

सत्ता के लिए भाई ने भाई को दिया धोखा, उद्धव के दुश्मन संग राज ने मिलाया हाथ, UBT नाराज, टूटेगा भाईचारा?

महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा उलटफेर हो रहा है. कभी दोस्त दोस्त को दगा दे रहा तो कहीं भाई-भाई का साथ छोड़ रहा. जी हां, सत्ता के लिए राज ठाकरे ने अपने ही भाई उद्धव ठाकरे को धोखा दिया है. कल्याण-डोंबिवली नगर निगम (KDMC) में राज ठाकरे की मनसे यानी

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना को समर्थन दे दिया. यह फैसला उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि राज और उद्धव ने हाल ही में एक साथ मिलकर महायुति के खिलाफ साथ चुनाव लड़ा था. अब मनसे के इस कदम से उद्धव ठाकरे नाराज हैं. उद्धव ने कल यानी बुधवार को कॉरपोरेटर्स के साथ हुई बैठक में अपनी नाराजगी जताई. अब सवाल है कि क्या मनसे के इस कदम से ठाकरे भाईयों का भाईचारा खत्म हो जाएगा?

सबसे पहले जानते हैं कि राज ठाकरे की मनसे ने कैसे उद्धव ठाकरे की शिवसेना को झटका दिया है. दरअसल, केडीएमसी यानी कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है. यहां कुल 122 सीटों में बहुमत के लिए 62 चाहिए. एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना ने सबसे ज्यादा 53 सीटें जीतीं. भाजपा को 50 मिलीं. मनसे को 5, उद्धव गुट (UBT) को 11 और शरद पवार गुट की एनसीपी को 1 सीट मिली. चुनाव से पहले उद्धव और राज ने गठबंधन किया था, ताकि महायुति (शिंदे सेना-BJP) को हराया जा सके, लेकिन नतीजों के बाद सब कुछ बदल गया.
भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एकनाथ शिंदे ने मनसे पार्षदों पर डोरे डाले. इधर राज ठाकरे की मनसे ने भी अचानक शिंदे सेना को समर्थन का ऐलान कर दिया. मनसे का कहना है कि राज ठाकरे की सहमति से यह फैसला लिया गया. मनसे के सपोर्ट में आने से एनकाथ शिंदे गुट का आंकड़ा 53 से बढ़कर 58 हो गया. साथ ही शरद पवार NCP के 1 कॉर्पोरेटर ने भी समर्थन दिया. वहीं, उद्धव गुट के 11 में से 4 कॉर्पोरेटर ‘अनरिचेबल’ हैं, यानी संपर्क में नहीं. अगर वे शिंदे की तरफ जाते हैं, तो शिंदे गुट बहुमत पार कर सकता है. इसका मतलब है कि भाजपा यहां सत्ता से दूर ही रहेगी.
उद्धव ने कैसे नाराजगी जाहिर की?
मनसे के इसी समर्थन से उद्धव ठाकरे नाराज हैं. यह जगजाहिर है कि उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे दोनों सियासी दुश्मन हैं. शिंदे ने शिवसेना तोड़कर अपनी अलग शिवसेना बनाई है. असली शिवसेना किसके पास है, यह लड़ाई कोर्ट में जारी है. बहरहाल, मनसे के कल्याण-डोंबिवली में शिंदे के साथ जाने से उद्धव ठाकरे नाराज़ हैं. उद्धव ने कल यानी बुधवार को अपने कॉरपोरेटर के साथ की बैठक की और नाराजगी जताई. उन्होंने कहा कि अगर कल्याण-डोंबिवली में मनसे शिंदे के साथ नहीं गई होती, तो विपक्ष की ताकत उन्हें दिखाई देती. मनसे के वहां के स्थानीय नेताओं ने ऐसा फैसला क्यों लिया? यह फैसला नहीं लेना चाहिए था… अगर मनसे और हमारे पार्टी के सभी नगरसेवक एकजुट रहते, तो कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में एक मजबूत विपक्षी समूह बैठा होता.
क्या भाईचारा टूटेगा?
मनसे के इस कदम से अब सवाल है कि क्या भाईचारा टूटेगा? वह भी तब, जब करीब 20 साल बाद दोनों भाई एक साथ आए हैं. अब तक उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की सियासी राहें अलग हुआ करती थीं, मगर निकाय चुनाव में महायुति को टक्कर देने के लिए दोनों भाई साथ आए. अब जब चुनावी नतीजे आ गए तो मेयर की कुर्सी पाने के लिए अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग खेल चल रहा है. कुल मिलाकर केडीएमसी में मनसे का समर्थन शिंदे के लिए फायदेमंद है, लेकिन यूबीटी यानी उद्धव गुट के लिए बड़ा झटका. क्या ठाकरे भाइयों का रिश्ता टूट जाएगा? या यह सिर्फ लोकल राजनीति है? आने वाले दिन बताएंगे. फिलहाल, मेयर चुनाव पर सबकी नजरें हैं. विकास के नाम पर सत्ता की यह जंग महाराष्ट्र की राजनीति को और रोचक बना रही है.
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