
बड़े होने पर क्यों सामने आ रहा है ऑटिज्म का सच? डॉक्टर से जानें इसके लक्षण और वजह
आज के समय में ऑटिज्म (Autism Spectrum Disorder – ASD) को लेकर लोगों में जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। पहले इसे केवल बचपन में पहचानी जाने वाली स्थिति माना जाता था, लेकिन अब बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं, जिन्हें वयस्क होने के बाद पता चल रहा है कि वे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम पर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा इसलिए नहीं है कि बड़े होने पर ऑटिज्म विकसित हो जाता है, बल्कि बचपन में इसके लक्षण पहचान में नहीं आ पाते और बाद में सही जांच के दौरान इसका पता चलता है।
ऑटिज्म क्या है?
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक न्यूरोडेवलपमेंटल कंडीशन है, जो व्यक्ति के सोचने, सीखने, संवाद करने और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए इसे “स्पेक्ट्रम” कहा जाता है।
बड़े होने पर क्यों चलता है पता?
विशेषज्ञों के अनुसार, कई लोग बचपन से ही ऑटिज्म के हल्के लक्षणों के साथ बड़े होते हैं, लेकिन वे सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना (Masking) सीख लेते हैं। नौकरी, उच्च शिक्षा, शादी या बढ़ती सामाजिक जिम्मेदारियों के दौरान जब चुनौतियां बढ़ती हैं, तब ये लक्षण अधिक स्पष्ट होने लगते हैं। इसके बाद मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लेने पर ऑटिज्म की पहचान हो सकती है।
ऑटिज्म के सामान्य लक्षण
- दूसरों से बातचीत या सामाजिक संबंध बनाने में कठिनाई।
- आंखों में आंख डालकर बात करने से बचना।
- एक ही दिनचर्या को बार-बार दोहराने की आदत और उसमें बदलाव पसंद न करना।
- किसी खास विषय में अत्यधिक रुचि या गहरी जानकारी रखना।
- तेज आवाज, तेज रोशनी या कुछ विशेष स्पर्श के प्रति अधिक संवेदनशील होना।
- चेहरे के भाव या दूसरों की भावनाओं को समझने में कठिनाई।
- अकेले रहना अधिक पसंद करना या सामाजिक माहौल में असहज महसूस करना।
क्या वयस्कों में इलाज संभव है?
डॉक्टरों का कहना है कि ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं है, इसलिए इसका “इलाज” नहीं होता। हालांकि सही समय पर पहचान होने से व्यक्ति को काउंसलिंग, व्यवहार थेरेपी, स्पीच थेरेपी (यदि जरूरत हो) और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के माध्यम से रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर ढंग से संभालने में मदद मिल सकती है।
कब लें डॉक्टर की सलाह?
यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से सामाजिक संवाद, व्यवहार या संवेदी (Sensory) समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और ये उसकी पढ़ाई, नौकरी या निजी जीवन को प्रभावित कर रही हैं, तो मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से परामर्श लेना उचित रहेगा। विशेषज्ञ विस्तृत मूल्यांकन के बाद सही निदान और आवश्यक सहायता की सलाह देते हैं।
बढ़ रही है जागरूकता
विशेषज्ञों का मानना है कि वयस्कों में ऑटिज्म के अधिक मामले सामने आने का मुख्य कारण जागरूकता, बेहतर स्क्रीनिंग और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक बढ़ती पहुंच है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को जीवन में बाद में ऑटिज्म का निदान मिलता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि ऑटिज्म नया विकसित हुआ है, बल्कि उसकी पहचान अब जाकर हो पाई है।
नोट: यदि आपको या आपके किसी परिचित में ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं, तो स्वयं निष्कर्ष निकालने के बजाय योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मूल्यांकन कराना सबसे सही कदम है।

