प्रदर्शन के दौरान ‘फेशियल रिकग्निशन’ से लोगों की पहचान के खिलाफ याचिका, सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार

प्रदर्शन के दौरान ‘फेशियल रिकग्निशन’ से लोगों की पहचान के खिलाफ याचिका, सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार

नई दिल्ली: प्रदर्शन और विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दाखिल की गई है। याचिका में मांग की गई है कि प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए या इसके लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा और दिशानिर्देश तय किए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार करने पर सहमति जताई है।

याचिका में फेशियल रिकग्निशन तकनीक के जरिए प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान किए जाने को निजता के अधिकार से जोड़ते हुए सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल किसी व्यक्ति की तस्वीर या चेहरे के बायोमेट्रिक डेटा का इस्तेमाल उसकी जानकारी और उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना किया जाना नागरिकों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।

निजता के अधिकार पर उठे सवाल

याचिका का सबसे अहम पहलू नागरिकों के निजता के अधिकार से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही निजता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दे चुका है। ऐसे में सवाल यह है कि सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस या अन्य एजेंसियों द्वारा चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल की सीमा क्या होनी चाहिए।

याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि किसी प्रदर्शन में शामिल होना अपने आप में अपराध नहीं है। ऐसे में केवल प्रदर्शन में मौजूद होने के आधार पर किसी व्यक्ति की पहचान करना, उसका डेटा एकत्र करना या भविष्य में निगरानी के लिए उसका इस्तेमाल करना किस कानूनी आधार पर किया जा सकता है, इस पर स्पष्टता जरूरी है।

प्रदर्शनकारियों की निगरानी को लेकर चिंता

फेशियल रिकग्निशन तकनीक के जरिए किसी व्यक्ति के चेहरे को कैमरे से स्कैन करके उपलब्ध डेटाबेस में मौजूद तस्वीरों से मिलान किया जा सकता है। इससे पुलिस को किसी संदिग्ध व्यक्ति की पहचान करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसके साथ नागरिकों की निजता और निगरानी को लेकर चिंताएं भी जुड़ी हैं।

याचिका में आशंका जताई गई है कि यदि इस तकनीक के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट नियम नहीं बनाए गए तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल नागरिक भी लगातार निगरानी के दायरे में आ सकते हैं।

पुलिसिंग और निजता के बीच संतुलन जरूरी

फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल अपराध की जांच, लापता लोगों की पहचान और सुरक्षा व्यवस्था जैसे मामलों में किया जा सकता है। हालांकि, इसके इस्तेमाल को लेकर यह सवाल लगातार उठता रहा है कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां इस तकनीक का उपयोग किस सीमा तक कर सकती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यह महत्वपूर्ण मुद्दा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के निजता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

कोर्ट के फैसले पर टिकी नजरें

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट यह भी देख सकता है कि प्रदर्शन के दौरान फेशियल रिकग्निशन के इस्तेमाल के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हैं या इस संबंध में अलग से स्पष्ट दिशानिर्देशों की जरूरत है।

यदि अदालत इस मामले में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करती है, तो इसका असर केवल प्रदर्शन और धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर फेशियल रिकग्निशन और डिजिटल निगरानी के इस्तेमाल के व्यापक नियमों पर भी पड़ सकता है।

अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर हैं, क्योंकि यह मामला तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के दौर में नागरिक स्वतंत्रता, निजता और पुलिस की निगरानी शक्तियों के बीच संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल बन गया है।

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