
नेहरू की अंतिम यात्रा: 15 लाख लोगों की भीड़, नम आंखें और गूंजते नारे, न्यूयॉर्क टाइम्स ने किया था ऐतिहासिक वर्णन
नई दिल्ली। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru के निधन के बाद 29 मई 1964 को निकली उनकी अंतिम यात्रा भारतीय इतिहास के सबसे भावुक और ऐतिहासिक क्षणों में से एक मानी जाती है। उस दिन राजधानी दिल्ली की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा था। देश अपने सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक को अंतिम विदाई देने के लिए सड़कों पर उतर आया था।
अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र The New York Times ने भी इस ऐतिहासिक क्षण को विस्तार से कवर किया था। अपनी रिपोर्ट में अखबार ने लिखा कि नई दिल्ली की सड़कों पर करीब 15 लाख लोग पंक्तिबद्ध खड़े थे। हर कोई अपने प्रिय नेता की अंतिम झलक पाने और उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए घंटों इंतजार कर रहा था।
रिपोर्ट के अनुसार, नेहरू का पार्थिव शरीर एक खुले वाहन पर रखा गया था ताकि अंतिम यात्रा के छह मील लंबे मार्ग पर मौजूद लोग उन्हें अंतिम बार देख सकें। यात्रा की शुरुआत तीनमूर्ति भवन स्थित उनके आधिकारिक आवास से हुई और यह राजघाट के निकट उस स्थल तक पहुंची जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।
पूरे मार्ग में लोगों की आंखें नम थीं। “नेहरू अमर रहें” के नारे लगातार गूंज रहे थे और जगह-जगह से फूलों की वर्षा की जा रही थी। लोगों की भावनाएं इतनी प्रबल थीं कि कई स्थानों पर भीड़ को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो गया था।
अंतिम यात्रा की सुरक्षा की जिम्मेदारी भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के जवानों ने संभाली थी। तीनों सेनाओं के जवान पूरे मार्ग पर तैनात रहे और राजघाट तक सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखी। यह केवल एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि उस नेता को राष्ट्र की भावभीनी विदाई थी जिसने स्वतंत्र भारत की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
नेहरू के निधन ने पूरे देश को शोक में डुबो दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे नेहरू ने करीब 17 वर्षों तक देश का नेतृत्व किया। उनकी मृत्यु के बाद देशभर में शोक की लहर दौड़ गई थी और लाखों लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली पहुंचे थे।
आज, 62 वर्ष बाद भी नेहरू की अंतिम यात्रा की तस्वीरें और उस समय की रिपोर्टें भारतीय इतिहास के एक भावुक अध्याय की याद दिलाती हैं। यह वह क्षण था जब पूरा देश अपने पहले प्रधानमंत्री को अंतिम विदाई देने के लिए एकजुट दिखाई दिया था।

