
झारखंड में सरना विवाद: क्या है सरना धर्म और क्यों उठ रही डीलिस्टिंग की मांग?
झारखंड समेत कई आदिवासी बहुल राज्यों में इन दिनों सरना धर्म और डीलिस्टिंग की मांग को लेकर बहस तेज हो गई है। सरना आस्था को मानने वाले आदिवासी समुदाय प्रकृति की पूजा करते हैं और जंगल, पहाड़, नदी तथा पवित्र वृक्षों को धार्मिक महत्व देते हैं। सरना स्थलों पर सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की जाती है और इसे आदिवासी संस्कृति एवं परंपरा का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। लंबे समय से सरना धर्म को जनगणना में अलग धार्मिक कोड देने की मांग भी उठती रही है।
विवाद का केंद्र यह है कि कुछ संगठनों का आरोप है कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर ईसाई या मुस्लिम बन चुके हैं, वे भी अनुसूचित जनजाति (ST) के संवैधानिक लाभ और पारंपरिक सरना धार्मिक गतिविधियों में भागीदारी बनाए हुए हैं। इसी को आधार बनाकर कुछ सामाजिक संगठनों ने “डीलिस्टिंग” की मांग उठाई है। उनका कहना है कि जिन लोगों ने अपनी मूल धार्मिक पहचान बदल ली है, उन्हें आदिवासी धार्मिक परंपराओं और उससे जुड़े विशेष अधिकारों का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
हालांकि, यह विषय सामाजिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक दृष्टि से काफी संवेदनशील है। कई आदिवासी संगठन और विशेषज्ञ मानते हैं कि अनुसूचित जनजाति की पहचान केवल धर्म से नहीं, बल्कि समुदाय, परंपरा, संस्कृति और सामाजिक स्थिति से भी जुड़ी होती है। फिलहाल डीलिस्टिंग की मांग पर विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है, लेकिन इस संबंध में किसी बड़े नीतिगत बदलाव के लिए केंद्र सरकार और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के तहत निर्णय लिया जाना आवश्यक होगा।

