
‘खतरों के खिलाड़ी 15’ से जल्दी बाहर होने पर छलका अविका गौर का दर्द, बोलीं- बाहर बैठकर हीरो बनना आसान
टीवी अभिनेत्री अविका गौर ने रियलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी 15’ से जल्दी बाहर होने के बाद पहली बार अपने अनुभव और भावनाओं को लेकर खुलकर बात की है। शो से एलिमिनेट होने के बाद अविका ने सोशल मीडिया पर एक लंबा नोट शेयर किया, जिसमें उन्होंने बताया कि शो के सफर ने उन्हें अपने बारे में काफी कुछ सोचने और समझने का मौका दिया।
अविका के लिए शो से इतनी जल्दी बाहर होना आसान नहीं था। उन्होंने स्वीकार किया कि जब वह घर पर बैठकर ‘खतरों के खिलाड़ी’ के एपिसोड देखती हैं तो कई बार उनके मन में आता है कि अगर वह उस समय शो का हिस्सा होतीं तो शायद स्टंट को और बेहतर तरीके से कर पातीं।
लेकिन इसी सोच के साथ उन्हें यह भी एहसास हुआ कि टीवी पर बैठकर किसी स्टंट को देखना और वास्तविक परिस्थिति में डर, दबाव और एड्रेनालिन के बीच वही स्टंट करना बिल्कुल अलग अनुभव है।
एलिमिनेशन के बाद बार-बार आता है ख्याल
अविका गौर ने अपने इंस्टाग्राम नोट में लिखा कि ‘खतरों के खिलाड़ी’ देखने के बाद उन्हें अपने बारे में एक खास बात महसूस हुई।
उन्होंने बताया कि शो देखते हुए कई बार वह खुद से कहती हैं कि अगर वह वहां होतीं तो हार नहीं मानतीं, और ज्यादा कोशिश करतीं और शायद बेहतर प्रदर्शन करतीं।
यह भावना उनके लिए स्वाभाविक भी है, क्योंकि किसी प्रतियोगिता से जल्दी बाहर होने के बाद अक्सर इंसान अपने प्रदर्शन को दोबारा सोचता है और मन में अलग-अलग संभावनाएं बनाता है।
अविका ने भी अपने अनुभव को इसी तरह बयान किया और बताया कि शो से बाहर आने के बाद उनके मन में कई ‘क्या होता अगर…’ वाले सवाल आते हैं।
‘सोफे पर बैठकर खुद को एक्सपर्ट समझने लगती हूं’
अविका ने अपने नोट में इस स्थिति को हल्के-फुल्के अंदाज में भी समझाया। उन्होंने कहा कि जब वह आराम से सोफे पर बैठकर शो देखती हैं तो उन्हें ऐसा लगने लगता है जैसे वह ‘खतरों के खिलाड़ी’ की एक्सपर्ट बन गई हैं।
लेकिन अगले ही पल उन्हें वास्तविकता याद आती है कि वह अपने आरामदायक माहौल में बैठकर शो देख रही हैं।
वहां न तो प्रतियोगियों पर वैसा दबाव है और न ही स्टंट करने के दौरान महसूस होने वाला डर। ऐसे में बाहर से किसी स्टंट या फैसले को जज करना आसान हो जाता है।
असली चुनौती कैमरे के सामने होती है
अविका की बात का सबसे अहम हिस्सा यही था कि किसी परिस्थिति को बाहर से देखना और खुद उसके बीच होना अलग-अलग चीजें हैं।
‘खतरों के खिलाड़ी’ जैसे शो में प्रतियोगियों को स्टंट के दौरान समय का दबाव, डर, मानसिक तनाव और प्रदर्शन की जिम्मेदारी का सामना करना पड़ता है।
घर पर बैठकर दर्शक पूरे स्टंट को एक अलग नजरिए से देखता है। लेकिन प्रतियोगी के लिए वही चुनौती बिल्कुल वास्तविक होती है।
अविका ने इसी अंतर को स्वीकार करते हुए कहा कि बाहर बैठकर किसी परिस्थिति का हीरो बनना काफी आसान है।
‘हम कहानी का ऐसा वर्जन बना लेते हैं जो हुआ ही नहीं’
अविका ने अपने नोट में इंसानी सोच के एक दिलचस्प पहलू पर भी बात की।
उन्होंने कहा कि जब कोई चीज हमारे लिए बहुत मायने रखती है तो हम उसे बार-बार अपने दिमाग में दोहराते हैं। हम अलग-अलग फैसलों की कल्पना करते हैं और सोचते हैं कि अगर उस समय हमने दूसरा फैसला लिया होता तो परिणाम कुछ और होता।
ऐसा करते-करते हम अपने दिमाग में घटना की एक नई कहानी बना लेते हैं, जो असल में कभी हुई ही नहीं।
अविका ने अपने एलिमिनेशन के बाद महसूस होने वाली भावनाओं को भी इसी नजरिए से देखा।
शो ने खुद को देखने का नजरिया बदला
अभिनेत्री ने यह भी बताया कि ‘खतरों के खिलाड़ी’ का अनुभव उनके लिए सिर्फ एक रियलिटी शो तक सीमित नहीं रहा। इसने उनकी जिंदगी और खुद को देखने के नजरिए पर भी असर डाला है।
शो में किसी चुनौती का सामना करना और फिर उसके परिणाम को स्वीकार करना उनके लिए सीखने वाला अनुभव रहा।
एलिमिनेशन के बाद निराशा होना स्वाभाविक है, लेकिन अविका अब अपने अनुभव को एक सीख की तरह देखने की कोशिश कर रही हैं।
एलिमिनेशन के बावजूद सकारात्मक नजरिया
अविका गौर के नोट से यह भी साफ है कि उन्हें अपने प्रदर्शन को लेकर कुछ अफसोस जरूर है, लेकिन वह केवल पछतावे में नहीं रहना चाहतीं।
शो को बाहर से देखने के बाद उन्हें यह समझ आया कि परिस्थितियों का आकलन करना आसान है, लेकिन जब वही चुनौती खुद के सामने आती है तो चीजें काफी अलग होती हैं।
यही एहसास उनके लिए ‘खतरों के खिलाड़ी 15’ के सफर की सबसे बड़ी सीखों में से एक बन गया है।
अविका ने फैंस से साझा की दिल की बात
‘खतरों के खिलाड़ी 15’ से जल्दी बाहर होने के बाद अविका गौर ने जिस तरह अपने अनुभव को शब्दों में रखा, उससे उनके फैंस को उनके नजरिए को समझने का मौका मिला।
उन्होंने एलिमिनेशन को सिर्फ हार के तौर पर देखने के बजाय उससे मिली सीख पर ध्यान दिया। साथ ही यह भी स्वीकार किया कि किसी चुनौती को बाहर से देखकर उसका सही आकलन करना आसान है, लेकिन उसे खुद जीना बिल्कुल अलग अनुभव होता है।
उनकी बात का सार यही है कि हर ‘क्या होता अगर’ का जवाब तलाशना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी किसी अनुभव को स्वीकार करना और उससे आगे बढ़ना ही सबसे बड़ी सीख होती है।

