
एंटी पेपर लीक बिल पर संसद में मचा बवाल, अखिलेश-रिजिजू भिड़े, कौन पड़ा भारी?
नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र में मंगलवार को पब्लिक एग्जामिनेशन्स (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 (एंटी पेपर लीक बिल) पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। बहस का सबसे चर्चित क्षण तब आया जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू आमने-सामने आ गए। दोनों नेताओं के बीच पेपर लीक से लेकर इमरजेंसी और शिक्षा व्यवस्था तक तीखे सवाल-जवाब हुए, जिससे सदन का माहौल गर्मा गया।
चर्चा की शुरुआत में अखिलेश यादव ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि देश का युवा लगातार पेपर लीक, भर्ती घोटालों और शिक्षा व्यवस्था की खामियों से परेशान है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब 2024 में भी पेपर लीक रोकने के लिए कानून बनाया गया था, तो फिर बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों हुईं? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कानून बनाने से ज्यादा अपनी छवि बचाने में लगी रही और लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि युवाओं का गुस्सा बढ़ता गया तो यह सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
अखिलेश यादव ने अपने भाषण में उत्तर प्रदेश की शिक्षक भर्ती, सरकारी स्कूलों की स्थिति और प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि युवाओं का विश्वास लगातार टूट रहा है और सरकार को केवल सख्त कानून नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी। उन्होंने यह भी मांग की कि पेपर लीक से प्रभावित छात्रों को न्याय मिले और जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई की जाए।
इसी दौरान संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अखिलेश यादव के आरोपों का जवाब देते हुए विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया। रिजिजू ने कहा कि सरकार पेपर लीक जैसी घटनाओं को गंभीरता से लेकर मजबूत कानून ला रही है और इस विषय पर जितनी लंबी चर्चा चाहिए, सरकार उसके लिए तैयार है। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि क्या आंदोलन के बाद कानून बनाना बेहतर है या फिर आंदोलन दबाने के लिए देश में इमरजेंसी लगाना? इस सवाल के साथ ही सदन में माहौल और गर्म हो गया।
रिजिजू के इमरजेंसी वाले बयान पर अखिलेश यादव ने तुरंत पलटवार किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने इमरजेंसी नहीं देखी, लेकिन दिल्ली की सीमाओं पर किसानों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई, आंसू गैस और बैरिकेडिंग जैसे दृश्य जरूर देखे हैं, जो किसी इमरजेंसी से कम नहीं थे। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी के बाद देश में बदलाव आया था और अब भी जनता बदलाव लाने का मन बना चुकी है। इस बयान पर विपक्षी सांसदों ने जोरदार मेजें थपथपाईं, जबकि सत्ता पक्ष ने इसका विरोध किया।
बहस के दौरान विपक्ष ने सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने, परीक्षाओं में पारदर्शिता की कमी और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने के आरोप लगाए। वहीं सरकार ने दावा किया कि नया संशोधन विधेयक परीक्षा माफियाओं, संगठित गिरोहों और तकनीकी माध्यमों से होने वाले पेपर लीक पर सख्त रोक लगाएगा तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।
कौन पड़ा भारी?
संसद की इस बहस में दोनों नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक और वैचारिक तर्क पूरे दमखम के साथ रखे। अखिलेश यादव ने युवाओं, शिक्षा व्यवस्था और सरकार की जवाबदेही को मुद्दा बनाया, जबकि किरेन रिजिजू ने सरकार के नए कानून और विपक्ष के पिछले रिकॉर्ड का हवाला देते हुए जवाब दिया। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह मुकाबला तर्क और राजनीतिक संदेश दोनों स्तरों पर बराबरी का रहा। किसका पक्ष ज्यादा प्रभावी रहा, इसका अंतिम फैसला जनता और राजनीतिक विश्लेषण पर निर्भर करेगा।

