
मिड-डे मील में बच्चों को अंडा परोसने की शुरुआत किसने की थी? जानें कब और कहां लिया गया था फैसला
मिड-डे मील में बच्चों को अंडा परोसने की शुरुआत किसने की थी? जानें कब और कहां लिया गया था फैसला
नई दिल्ली। भारत में स्कूलों में चल रही मिड-डे मील (Mid-Day Meal) योजना में बच्चों को अंडा परोसने की शुरुआत को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। यह फैसला अलग-अलग राज्यों में अलग समय पर लिया गया था, लेकिन इसका उद्देश्य बच्चों के पोषण (Nutrition) को बेहतर बनाना था।
मिड-डे मील योजना क्या है?
मिड-डे मील योजना का उद्देश्य सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में बच्चों को मुफ्त भोजन देकर उनकी पोषण स्थिति सुधारना और स्कूल में उपस्थिति बढ़ाना है।
अंडा शामिल करने की शुरुआत कब और कहां हुई?
भारत में सबसे पहले मिड-डे मील में अंडा शामिल करने की पहल दक्षिण भारत के राज्यों में हुई थी।
- तमिलनाडु को इस दिशा में सबसे अग्रणी माना जाता है
- राज्य सरकार ने बच्चों के पोषण स्तर को सुधारने के लिए मिड-डे मील में अंडा शामिल करने का निर्णय लिया
- बाद में कई अन्य राज्यों ने भी इसी मॉडल को अपनाया
तमिलनाडु में यह कदम 2000 के दशक की शुरुआत में तेजी से लागू किया गया और इसे सफल पायलट मॉडल माना गया।
क्यों लिया गया यह फैसला?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे मुख्य कारण थे—
- बच्चों में प्रोटीन और पोषण की कमी
- एनीमिया और कुपोषण के मामले
- ग्रामीण क्षेत्रों में कमज़ोर स्वास्थ्य स्थिति
- पढ़ाई में ध्यान और शारीरिक विकास में सुधार
अंडा को एक सस्ता और उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन स्रोत माना गया, इसलिए इसे भोजन में शामिल किया गया।
देश के अन्य राज्यों में विस्तार
तमिलनाडु के बाद कई राज्यों ने भी बच्चों के मिड-डे मील में अंडा शामिल किया, जैसे—
- कर्नाटक
- ओडिशा
- आंध्र प्रदेश
- झारखंड (कुछ जिलों में)
हालांकि कुछ राज्यों में इसे लेकर सामाजिक और धार्मिक कारणों से बहस भी हुई, जिसके कारण हर जगह इसे समान रूप से लागू नहीं किया जा सका।
फैसले पर विवाद भी रहा
अंडा शामिल करने को लेकर कुछ जगहों पर विरोध भी हुआ—
- शाकाहारी समुदायों की आपत्ति
- स्थानीय सांस्कृतिक मान्यताएं
- स्कूल स्तर पर अलग-अलग नीतियां
इसके बावजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इसे बच्चों के लिए फायदेमंद मानते रहे।
निष्कर्ष
मिड-डे मील में अंडा शामिल करने की शुरुआत सबसे पहले तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में पोषण सुधार के उद्देश्य से की गई थी। यह कदम बच्चों में कुपोषण कम करने और उनकी सेहत सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जाता है।

