हिटलर के दौर में जर्मनी का असली कट्टर दुश्मन कौन था—ईरान या अमेरिका

Adolf Hitler के नेतृत्व में जर्मनी ने 1930 और 1940 के दशक में जिस आक्रामक नीति को अपनाया, उसने पूरे विश्व को एक भीषण संघर्ष की ओर धकेल दिया, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में जर्मनी ने यूरोप के कई देशों पर कब्जा करने की कोशिश की और अपनी ताकत का विस्तार किया, लेकिन इसके सामने एक मजबूत गठबंधन खड़ा हो गया जिसे मित्र राष्ट्र (Allied Powers) कहा गया। इन मित्र राष्ट्रों में प्रमुख रूप से अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ शामिल थे। शुरुआत में अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल नहीं था, लेकिन दिसंबर 1941 में पर्ल हार्बर पर हमला के बाद अमेरिका ने युद्ध में प्रवेश किया और इसके बाद जर्मनी के खिलाफ उसकी भूमिका बेहद निर्णायक हो गई।

अमेरिका की औद्योगिक शक्ति, विशाल सैन्य संसाधन और आधुनिक तकनीक ने जर्मनी की रणनीतियों को कमजोर कर दिया। अमेरिका ने न केवल यूरोप में सैनिक भेजे, बल्कि आर्थिक और सैन्य सहायता के जरिए ब्रिटेन और सोवियत संघ को भी मजबूत किया। 1944 में डी-डे लैंडिंग के दौरान अमेरिका और उसके सहयोगियों ने फ्रांस के नॉरमैंडी तट पर उतरकर जर्मनी के कब्जे को तोड़ना शुरू किया, जो युद्ध का एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। दूसरी ओर, सोवियत संघ ने पूर्वी मोर्चे पर जर्मनी को भारी नुकसान पहुंचाया और बर्लिन तक पहुंचकर जर्मनी की हार सुनिश्चित की। इस तरह अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने मिलकर जर्मनी को चारों तरफ से घेर लिया, जिससे अंततः 1945 में जर्मनी की हार हो गई।

वहीं अगर ईरान की बात करें, तो वह इस पूरे युद्ध में जर्मनी का प्रत्यक्ष या “कट्टर” दुश्मन नहीं था। ईरान उस समय एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश जरूर था, क्योंकि वहां से तेल की आपूर्ति और सैन्य रसद का मार्ग गुजरता था। 1941 में ब्रिटेन और सोवियत संघ ने ईरान पर नियंत्रण स्थापित कर लिया ताकि जर्मनी को वहां से कोई मदद न मिल सके और मित्र राष्ट्रों की सप्लाई लाइन सुरक्षित रहे। हालांकि इस घटनाक्रम का उद्देश्य जर्मनी को कमजोर करना था, लेकिन ईरान खुद जर्मनी के खिलाफ मुख्य युद्ध लड़ने वाला देश नहीं बना।

निष्कर्ष के तौर पर, यह स्पष्ट है कि हिटलर के दौर में जर्मनी का असली और सबसे बड़ा दुश्मन अमेरिका और उसके सहयोगी देश थे, जिन्होंने अपनी सामूहिक ताकत, रणनीति और संसाधनों के दम पर जर्मनी को पराजित किया। ईरान की भूमिका इस संघर्ष में सीमित और अप्रत्यक्ष रही, इसलिए उसे जर्मनी का “कट्टर दुश्मन” कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।

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