
EU ने भारत के अधिकांश सामान पर GSP छूट खत्म की, 20% टैरिफ बढ़ने से इंडस्ट्रियल एक्सपोर्ट प्रभावित
भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच लंबे समय से चल रही ट्रेड डील इन दिनों सुर्खियों में है। उम्मीद है कि अगले हफ्ते, 27 जनवरी तक, इस डील पर अंतिम सहमति बन जाएगी। लेकिन इस बीच EU ने भारत के अधिकांश सामानों पर जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) छूट वापस लेने का फैसला किया है, जो भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है।
GSP विड्रॉल का असर
विशेषज्ञों के मुताबिक, GSP छूट हटने के बाद भारत के अधिकांश सामानों पर EU टैरिफ 20% तक बढ़ जाएगा। इसका मतलब है कि अब भारतीय निर्यातक बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस (FIEO) के CEO और डायरेक्टर जनरल अजय सहाय ने बताया कि इसका सबसे ज्यादा असर इंडस्ट्रियल एक्सपोर्ट पर पड़ा है। इसमें मिनरल्स, केमिकल्स, प्लास्टिक, लोहा-स्टील, मशीनरी और इलेक्ट्रिकल सामान शामिल हैं, जो EU को भारत के शिपमेंट का बड़ा हिस्सा हैं। अब इन सभी को MFN (Most Favored Nation) ड्यूटी रेट के तहत एंट्री करनी होगी।
GSP क्या है?
GSP (Generalised System of Preferences) एक स्कीम है, जिसमें विकसित देश विकासशील देशों के चुनिंदा सामानों पर कम या शून्य टैरिफ लगाते हैं ताकि उनके निर्यात को बढ़ावा मिले। भारत में EU धीरे-धीरे 2016 से इस स्कीम के दायरे से बाहर होता जा रहा है।
क्या बचा है GSP में?
अब केवल 13% भारतीय निर्यात को ही GSP बेनिफिट मिलेगा। वित्त वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, EU को भारत से भेजे जाने वाले लगभग 47% (35.6 अरब डॉलर) सामान GSP के दायरे में आते हैं, जबकि 53% (40.2 अरब डॉलर) अब MFN ड्यूटी के दायरे में आ गए हैं।
आगे का परिदृश्य
हालांकि, भारत और EU के बीच FTA (Free Trade Agreement) पर हस्ताक्षर होने के बाद यह GSP विड्रॉल FTA के तहत प्रतिस्थापित हो जाएगा। लेकिन FTA के फायदे मिलने में कई महीने लग सकते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस समय GSP के हटने से भारत के एक्सपोर्ट मार्केट में प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ गया है, खासकर उन सेक्टर्स में जो EU को भारी मात्रा में निर्यात करते हैं।
निष्कर्ष:
भारत के लिए अलार्म बजने का कारण यह है कि GSP छूट हटने से तुरंत टैरिफ बढ़ जाएगा और भारत के एक्सपोर्टर्स को मूल्य और प्रतिस्पर्धा में नुकसान उठाना पड़ सकता है। FTA लागू होने तक यह अस्थायी झटका माना जा रहा है, लेकिन इंडस्ट्रियल सेक्टर और अन्य प्रमुख निर्यातक कंपनियों के लिए चुनौती बड़ी है।

