Meteorites: एक साल में धरती पर कितने उल्कापिंड गिरते हैं? जानिए हम उन्हें क्यों नहीं देख पाते

Meteorites: एक साल में धरती पर कितने उल्कापिंड गिरते हैं? जानिए हम उन्हें क्यों नहीं देख पाते

नई दिल्ली: रात के आसमान में टूटते तारे (Shooting Stars) देखना कई लोगों के लिए रोमांचक अनुभव होता है। हालांकि, जिन्हें हम आमतौर पर “टूटता तारा” कहते हैं, वे वास्तव में उल्काएं (Meteors) होती हैं। इनमें से कुछ ही पृथ्वी की सतह तक पहुंचकर उल्कापिंड (Meteorites) बन पाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि हर साल धरती पर आखिर कितने उल्कापिंड गिरते हैं और हमें उनके गिरने की खबर अक्सर क्यों नहीं मिलती?

हर साल कितने उल्कापिंड गिरते हैं?

वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार, हर दिन पृथ्वी पर करीब 40 से 100 टन तक अंतरिक्षीय धूल, छोटे पत्थर और अन्य सूक्ष्म कण गिरते हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश इतने छोटे होते हैं कि वायुमंडल में ही जलकर राख हो जाते हैं।

जहां तक वास्तविक उल्कापिंड (Meteorites) का सवाल है, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हर साल हजारों छोटे उल्कापिंड पृथ्वी की सतह तक पहुंचते हैं, जबकि लगभग 500 के आसपास ऐसे उल्कापिंड होते हैं जो इतने बड़े होते हैं कि उन्हें वैज्ञानिक रूप से खोजा और दर्ज किया जा सकता है। इनमें से बहुत कम ही लोगों की नजर में आते हैं।

ज्यादातर उल्कापिंड दिखाई क्यों नहीं देते?

इसके कई कारण हैं—

1. वायुमंडल में जल जाते हैं
जब कोई अंतरिक्षीय चट्टान पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती है, तो हवा के साथ अत्यधिक घर्षण के कारण उसका तापमान हजारों डिग्री तक पहुंच जाता है। अधिकांश छोटे पिंड पूरी तरह जल जाते हैं।

2. दूरदराज के इलाकों में गिरते हैं
पृथ्वी का लगभग 71% हिस्सा महासागरों से ढका है। बाकी बड़े हिस्से में जंगल, रेगिस्तान, पहाड़ और निर्जन क्षेत्र हैं। इसलिए अधिकांश उल्कापिंड ऐसी जगह गिरते हैं जहां कोई मौजूद नहीं होता।

3. आकार बहुत छोटा होता है
जो उल्कापिंड सतह तक पहुंचते भी हैं, उनमें से कई कंकड़ या छोटे पत्थर जितने होते हैं। उन्हें सामान्य चट्टानों से अलग पहचानना आसान नहीं होता।

क्या उल्कापिंड खतरनाक होते हैं?

ज्यादातर उल्कापिंड इतने छोटे होते हैं कि उनसे किसी तरह का खतरा नहीं होता। हालांकि, यदि कोई बड़ा क्षुद्रग्रह (Asteroid) या विशाल उल्कापिंड पृथ्वी से टकराए, तो वह गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे पिंड बेहद दुर्लभ होते हैं और दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां लगातार उनकी निगरानी करती हैं।

उल्का, उल्कापिंड और क्षुद्रग्रह में क्या अंतर है?

  • Meteoroid (उल्काखंड): अंतरिक्ष में मौजूद छोटा पत्थर या धातु का टुकड़ा।
  • Meteor (उल्का): जब वही पिंड पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जलता है, तो आसमान में चमकती लकीर दिखाई देती है।
  • Meteorite (उल्कापिंड): यदि उसका कोई हिस्सा जलने के बाद भी पृथ्वी की सतह तक पहुंच जाए, तो उसे उल्कापिंड कहा जाता है।

क्या भारत में भी गिरे हैं उल्कापिंड?

जी हां। भारत में भी समय-समय पर कई उल्कापिंड मिलने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। वैज्ञानिक इनका अध्ययन करके सौर मंडल की उत्पत्ति, ग्रहों के निर्माण और अंतरिक्ष के इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त करते हैं।

निष्कर्ष

हर साल पृथ्वी पर हजारों छोटे उल्कापिंड गिरते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश या तो वायुमंडल में जल जाते हैं या फिर समुद्रों और निर्जन क्षेत्रों में गिरते हैं। यही वजह है कि हमें इनके गिरने का पता अक्सर नहीं चल पाता। हालांकि, जब कोई बड़ा उल्कापिंड आबादी वाले इलाके में गिरता है, तो वह वैज्ञानिकों और आम लोगों दोनों के लिए चर्चा का विषय बन जाता है।

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