सिर्फ पूजा करने से नहीं मिलता मालिकाना हक, मंदिर मामले में गुजरात हाईकोर्ट का अहम निर्णय

सिर्फ पूजा करने से नहीं मिलता मालिकाना हक, मंदिर मामले में गुजरात हाईकोर्ट का अहम निर्णय

अहमदाबाद. मंदिर का पुजारी केवल पूजा-पाठ कराने वाला ‘देवता का सेवक’ होता है, वह मंदिर या उससे जुड़ी भूमि पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता है. गुजरात हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में यह अहम टिप्पणी की है. अदालत ने एक मंदिर के पुजारी की वह अपील खारिज कर दी, जिसमें उसने सार्वजनिक सड़क पर बने गणेश मंदिर की जमीन पर मालिकाना हक जताया था.

न्यायमूर्ति जेसी दोशी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि कोई भी पुजारी सिर्फ इसलिए जमीन का मालिक नहीं बन सकता क्योंकि वह वर्षों से वहां पूजा-अर्चना कर रहा है. अदालत ने कहा कि पुजारी का दर्जा केवल देवता के सेवक होता है, न कि भूमिस्वामी का.
कैसे शुरू हुआ विवाद?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक भूस्वामी ने अपनी संपत्ति के पास सार्वजनिक पहुंच मार्ग पर बने गणेश मंदिर पर आपत्ति जताई और सिविल कोर्ट में याचिका दायर कर मंदिर को हटाने की मांग की. निचली अदालत और पहली अपीलीय अदालत दोनों ने मंदिर के विध्वंस का आदेश दिया था. इसके खिलाफ मंदिर के पुजारी ने गुजरात हाईकोर्ट में दूसरी अपील दायर की. पुजारी ने दावा किया कि वह लंबे समय से वहां रहकर पूजा कर रहा है, इसलिए उसे प्रतिकूल कब्जे के आधार पर जमीन का मालिक माना जाना चाहिए.हाईकोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया. अदालत ने अपने फैसले में कहा, वह भूमिस्वामी नहीं है, वह केवल देवता का सेवक है. सेवक को यह अधिकार नहीं है कि वह यह दावा करे कि उसका कब्जा स्वामी की ओर से है और प्रतिकूल कब्जे के आधार पर उसका स्वामित्व परिपक्व हो गया है. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक सेवा या अनुष्ठान करने से किसी भूमि पर कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता. प्रतिकूल कब्जे के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि कब्जा वास्तविक मालिक के खिलाफ खुला, निरंतर और शत्रुतापूर्ण रहा हो.

पुजारी ने कोर्ट में क्या कहा?
इस मामले में पुजारी ने खुद स्वीकार किया कि वह भूमि पर दूसरों की जानकारी और सहमति से पूजा करता रहा है. अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में उसका कब्जा न तो शत्रुतापूर्ण था और न ही प्रतिकूल. अदालत ने यह भी नोट किया कि न तो मंदिर के किसी न्यासी ने और न ही देवता के किसी प्रतिनिधि ने जमीन पर स्वामित्व का दावा किया था. ऐसे में पुजारी अकेले किसी देवता या मंदिर की ओर से स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता.
सड़कों पर बनें धार्मिक निर्माणों पर क्या बोला कोर्ट?
हाईकोर्ट ने सार्वजनिक संपत्ति पर बने धार्मिक ढांचों के व्यापक मुद्दे पर भी टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सड़कों या रास्तों पर बने अनधिकृत धार्मिक निर्माणों को स्वामित्व के दावों के जरिए संरक्षित नहीं किया जा सकता. ऐसे निर्माण आम लोगों और भूस्वामियों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं और अदालतों को ऐसे मामलों में सख्ती दिखानी चाहिए.
CATEGORIES
Share This

COMMENTS

Wordpress (0)