मुंबई से ठाणे तक महायुति में घमासान: क्या मेयर की कुर्सी बिगाड़ेगी बीजेपी और शिंदे सेना का खेल?

मुंबई से ठाणे तक महायुति में घमासान: क्या मेयर की कुर्सी बिगाड़ेगी बीजेपी और शिंदे सेना का खेल?

मुंबई: महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनावों के नतीजे आने के बाद महायुति गठबंधन की जीत का जश्न अब अंदरूनी खींचतान में बदल गया है. मुंबई, ठाणे और कल्याण-डोंबिवली जैसे महत्वपूर्ण शहरों में मेयर की कुर्सी को लेकर बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बीच जबरदस्त द्वंद्व चल रहा है. मुंबई में जहां बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, वहीं ठाणे में शिंदे सेना का दबदबा बरकरार है. ऐसे में दोनों दल एक-दूसरे के गढ़ में ‘सम्मान’ और ‘हिस्सेदारी’ की मांग कर रहे हैं, जिसने गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, पार्षदों को टूटने से बचाने के लिए होटलों में शिफ्ट किया जा रहा है.
मुंबई में मेयर पद पर पेंच क्यों फंसा है?
मुंबई महानगरपालिका (BMC) के नतीजों में बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है, जबकि शिंदे सेना को केवल 29 सीटें मिली हैं. बीजेपी का तर्क है कि सबसे अधिक सीटें जीतने के कारण मेयर उनका होना चाहिए. दूसरी ओर, शिंदे सेना का कहना है कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की जन्मशताब्दी (23 जनवरी) आ रही है, ऐसे में शिवसैनिकों की भावना है कि मुंबई का मेयर शिवसेना से ही हो. एकनाथ शिंदे ने स्पष्ट किया है कि मेयर महायुति का ही होगा, लेकिन पर्दे के पीछे खींचतान जारी है. चर्चा है कि शिंदे इस गतिरोध को सुलझाने के लिए दिल्ली में आलाकमान से मुलाकात कर सकते हैं. बीजेपी इस बार मुंबई की सत्ता पर सीधे काबिज होने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती है.

ठाणे को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का अभेद्य किला माना जाता है, जहां उनकी शिवसेना ने 131 में से 75 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है. यहां शिंदे सेना को किसी के समर्थन की जरूरत नहीं है, लेकिन बीजेपी के विधायक निरंजन डावखरे ने नया दांव खेल दिया है. बीजेपी का कहना है कि अगर मुंबई में शिंदे सेना मेयर पद पर अड़ी है, तो ठाणे में बीजेपी को कम से कम दो साल के लिए मेयर का पद मिलना चाहिए. ठाणे बीजेपी इकाई ने संकेत दिए हैं कि अगर उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला, तो वे सत्ता में शामिल होने के बजाय विपक्ष में बैठने का विकल्प चुन सकते हैं. यह मांग शिंदे कैंप के लिए बड़ी सिरदर्द बन गई है क्योंकि ठाणे उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है.
कल्याण-डोंबिवली में बहुमत का आंकड़ा कहां अटका है?
कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) में स्थिति और भी ज्यादा पेचीदा हो गई है. यहां की 122 सीटों में से शिंदे सेना को 53 और बीजेपी को 50 सीटें मिली हैं, जबकि बहुमत के लिए 62 का जादुई आंकड़ा चाहिए. दोनों ही दल एक-दूसरे पर निर्भर हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर समझौता नहीं करना चाहते. शिंदे सेना ने बहुमत के करीब पहुंचने के लिए उद्धव गुट (UBT) के कुछ पार्षदों से संपर्क साधा है. वहीं बीजेपी का दावा है कि उनकी ताकत लगभग बराबर है, इसलिए मेयर पद का बंटवारा ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर होना चाहिए. यहां दोनों दल निर्दलीयों और छोटे दलों के पार्षदों को अपने पाले में लाने के लिए ‘ऑपरेशन लोटस’ और ‘धनुष-बाण’ की रणनीति अपना रहे हैं.
क्या उल्हासनगर में महायुति के बीच फूट पड़ गई है?
उल्हासनगर में टकराव सबसे ज्यादा खुलकर सामने आया है, जहां बीजेपी और शिंदे सेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. यहां बीजेपी को 37 और शिंदे सेना को 36 सीटें मिली हैं, जो बहुमत (40) से कम हैं. शिंदे सेना ने बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) के दो पार्षदों और निर्दलीयों से हाथ मिलाने की कोशिश शुरू कर दी है. बीजेपी इसे गठबंधन धर्म के खिलाफ मान रही है. यह स्थिति दर्शाती है कि स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के बीच अविश्वास की खाई कितनी गहरी हो चुकी है. गठबंधन के भीतर का यह शक्ति संतुलन अब महाराष्ट्र की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगा.

 

 

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