पश्चिम बंगाल का न्यू जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार के बीच का बिन्नागुड़ी स्टेशन, सुबह के 6.36 बजे, स्‍टेशन अधीक्षक (एसएस) के रूप में रखी एक

पश्चिम बंगाल का न्यू जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार के बीच का बिन्नागुड़ी स्टेशन, सुबह के 6.36 बजे, स्‍टेशन अधीक्षक (एसएस) के रूप में रखी एक

मशीन ( इंट्रूजन डिटेक्शन सिस्टम-आईडीएस) में हूटर बजने लगा. यह सुनकर एसएस तुरंत हरकत में आए और तुरंत उधर से गुजरने वाली ट्रेनों को धीमा चलाने का मैसेज जारी कर दिया. पूछने पर बताया कि ट्रैक के आसपास हाथी गुजरने की वजह से हूटर बजा था. भारतीय रेलवे ने ट्रेनों से हाथियों के रन ओवर ( कटने) की घटनाओं को रोकने के लिए नार्थ ईस्‍ट फ्रंटियर रेलवे में एलीफैंट कारिडोर में नई तकनीक का इस्‍तेमाल किया है. पहली बार न्‍यूज18 ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर रिपोर्टिंग की, जानें यह तकनीक कौन सी है और कैसे काम करती है?
नार्थ ईस्‍ट फ्रंटियर रेलवे के सेक्‍शन इंजीनियर इरफान आजम ने बताया कि न्यू जलपाईगुड़ी और अलीपुर द्वार सेक्‍शन में कई जगह एलीफैंट कॉरिडोर हैं, जहां पर हाथी ट्रैक पार कर एक ओर से दूसरी ओर जाते हैं. सेक्‍शन की कुल लंबाई 155 किमी. है. इसी में एक बिन्‍नीगुड़ी स्‍टेशन है, जहां पर यह तकनीक पायलट प्रोजेक्‍ट के रूप में इस्‍तेमाल की गयी थी, जो सफल रही है. अब और दूससरे सेक्‍शनों में भी इसका इस्‍तेमाल किया जाएगा.हाथी के ट्रैक के करीब आते ही बजा हूटर, स्‍टेशन मास्‍टर से लेकर लोको पायलट तक हुए अलर्ट, इरफान आजम ने बताया कि एलीफैंट कॉरिडोर में आसपास फाइबर केबल बिछाई गईं हैं, ये जमीन के जमीन के करीब एक फुट नीचे हैं. इनको तीन जगह कनेक्‍ट किया गया है. पहला डीआरएम आफिस ( कंट्रोल रूम) दूसरा संबंधित मास्‍टर और तीसरा वहां से गुजरने वाली ट्रेन के इंजन से जुड़ा है. तीनों जगह लैपटॉप जैसी एक मशीन रखी है, इसमें हाथी के गुजरने पर हूटर बज जाता है.एलीफैंट कॉरिडोर पर ट्रैक के दोनों ओर कुल 60 मीटर तक फाइबर केबल डाली गयी है, जो सेंसर का काम करती हैं. जैसे ही हाथी इस केबल के आसपास कदम रखेगा, सेंसर एक्टिव होकर मैसेज तीनों जगह पहुंचाता है और हूटर बजने लगता है. यह कॉरिडोर वन विभाग के साथ कोआर्डीनेट करके तैयार किया गया है.

किस जगह है हाथी, कैसे पता लगता है लोको पायलट को
हूटर बजाने के साथ मशीन यह भी बताती है कि किस स्‍टेशन के बीच, किस खंभे के आसपास हाथी है, यह सब भी तीनों जगह रखी मशीनों के डिस्प्‍ले में आ जाता है. उसी के अनुसार विशेष सावधानी के साथ लोको पायलट ट्रेन गुजारता है. इस तरह समझा जा सकता है कि मशीन वह स्‍थान भी बनाएगी, जहां पर हाथी गुजरा है.
कितनी जगह तकनीक का होगा इस्‍तेमाल
उन्‍होंने बताया कि केवल अभी एक ही यूनिट लगी है और कुल पूरे सेक्‍शन में आठ यूनिट और लगनी हैं, जिससे यह पूरा सेक्‍शन ही हाथियों के लिए सुरक्षित हो जाएगा. क्‍योंकि काफी संख्‍या में हाथी आते हैं. अभी नागरकाटा-चालसा और बानरहाट-करोन के बीच फाइबर डाला गया है. इसका असर भी दिख रहा है, तकनीक के इस्‍तेमाल के बाद ऐसे हादसे नहीं हुए हैं.
फाइबर डालने से पहले क्‍या हुआ रिसर्च
फाइबर डालने से पहले यह रिसर्च हुआ कि हाथी का वजन कितना होगा, उसके पैरों का साइज क्‍या होता है, कितनी दूरी पर दूसरा पैर रखा है, कितनी देर में दूसरा कदम जमीन पर होता है. इस तरह के तमाम रिसर्च के बाद केबल डाली गयी है, जिससे हाथी के पैर रखने से कंपन का पता सेंसर लगा लें कि यह हाथी ही है और हूटर बजा दे. क्‍योंकि इस तरह का कंपन ट्रैक पर ट्रेन के गुजरने से या एक साथ तमाम जानवरों से एक साथ इकट्ठे होने से हो सकता है.

 

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