
एक्सप्लेन: BRICS में PM मोदी ने क्यों कहा- टेक्नोलॉजी को हथियार मत बनाओ? चीन का AI दांव क्या है
नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर भारत और चीन की रणनीति खास चर्चा में रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS मंच से टेक्नोलॉजी और महत्वपूर्ण खनिजों को हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाने को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल किसी देश के स्वार्थ या दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए नहीं, बल्कि मानव कल्याण और साझा विकास के लिए होना चाहिए। BRICS की नई दिल्ली घोषणा में भी सुरक्षित, खुले, सुलभ और शांतिपूर्ण डिजिटल वातावरण तथा AI के सुरक्षित, समावेशी और भरोसेमंद इस्तेमाल पर जोर दिया गया है।
आखिर PM मोदी ने टेक्नोलॉजी को हथियार न बनाने की बात क्यों कही?
आज दुनिया में तकनीक केवल मोबाइल, इंटरनेट या सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं रह गई है। AI, सेमीकंडक्टर, क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा, साइबर टेक्नोलॉजी और एडवांस्ड कंप्यूटिंग किसी देश की आर्थिक और रणनीतिक ताकत का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में जिस देश के पास इन तकनीकों और जरूरी संसाधनों पर ज्यादा नियंत्रण होगा, वह वैश्विक सप्लाई चेन और बाजारों पर प्रभाव डाल सकता है।
इसी बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच पीएम मोदी ने चेताया कि तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों का इस्तेमाल दबाव बनाने के हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए। उनका जोर ऐसी व्यवस्था पर रहा जिसमें BRICS देश तकनीक को साझा विकास, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक प्रगति के लिए इस्तेमाल करें। भारत की BRICS अध्यक्षता में भी Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability को प्रमुख प्राथमिकताओं में रखा गया।
चीन का AI दांव क्या है?
BRICS सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने AI के क्षेत्र में एक बड़ा प्रस्ताव सामने रखा। चीन BRICS देशों के बीच ओपन-सोर्स AI इकोसिस्टम विकसित करने की दिशा में काम करना चाहता है। इसके तहत AI मॉडल, प्रशिक्षण, कंप्यूटिंग और डिजिटल क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में सहयोग बढ़ाने की बात सामने आई है।
इसे सिर्फ तकनीकी सहयोग के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। दुनिया में AI की दौड़ में अमेरिका की कंपनियों का प्रभाव काफी बड़ा है। चीन चाहता है कि BRICS और ग्लोबल साउथ के देशों के पास AI के लिए वैकल्पिक तकनीकी ढांचा हो, ताकि वे कुछ चुनिंदा पश्चिमी कंपनियों या देशों पर निर्भर न रहें। Reuters के मुताबिक शी जिनपिंग ने BRICS के लिए AI Open Source Zone समेत तकनीकी सहयोग बढ़ाने के कई प्रस्ताव रखे हैं।
ओपन-सोर्स AI से चीन को क्या फायदा होगा?
ओपन-सोर्स AI का मतलब broadly ऐसी तकनीक से है जिसके मॉडल या तकनीकी ढांचे को ज्यादा व्यापक स्तर पर इस्तेमाल और विकसित किया जा सकता है। अगर BRICS देश मिलकर ऐसे AI सिस्टम विकसित करते हैं तो इससे विकासशील देशों को महंगी विदेशी AI सेवाओं पर निर्भरता कम करने का अवसर मिल सकता है।
लेकिन इसके साथ चीन के लिए रणनीतिक फायदा भी जुड़ा हुआ है। अगर BRICS देशों में चीनी तकनीकी मानक, AI मॉडल और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ज्यादा इस्तेमाल होने लगते हैं तो चीन का तकनीकी प्रभाव भी बढ़ सकता है। इसलिए चीन का AI प्रस्ताव एक तरफ सहयोग और तकनीकी पहुंच की बात करता है, तो दूसरी तरफ इसे वैश्विक AI प्रभाव की दौड़ में चीन की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
भारत की रणनीति चीन से कितनी अलग है?
भारत AI को लेकर सहयोग का समर्थन करता है, लेकिन उसके साथ सुरक्षा, पारदर्शिता और मानव-केंद्रित इस्तेमाल पर भी जोर देता है। इससे पहले AI Impact Summit में पीएम मोदी ने कहा था कि AI का उद्देश्य मानवता के कल्याण से जुड़ा होना चाहिए। उन्होंने डेटा सुरक्षा, पारदर्शी सुरक्षा नियमों और AI में मानवीय मूल्यों को शामिल करने की जरूरत बताई थी।
BRICS घोषणा में भी AI को आर्थिक विकास और सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया गया है। साथ ही AI संसाधनों तक पहुंच, सुरक्षा, विश्वसनीयता, समावेशिता और जोखिमों को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
असली लड़ाई AI की नहीं, AI पर नियंत्रण की है
BRICS में हुई चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि आने वाले समय में AI सिर्फ तकनीक का विषय नहीं रहने वाला। यह अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, डेटा, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और भू-राजनीति से सीधे जुड़ जाएगा।
एक तरफ अमेरिका और चीन AI में वैश्विक नेतृत्व की दौड़ में हैं। दूसरी तरफ भारत जैसे देश चाहते हैं कि ग्लोबल साउथ केवल तकनीक का उपभोक्ता न बने, बल्कि AI के नियम तय करने और इसके विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।
यही वजह है कि PM मोदी का “टेक्नोलॉजी को हथियार न बनाने” वाला संदेश सिर्फ BRICS देशों के लिए एक सामान्य अपील नहीं माना जा रहा। इसके पीछे सप्लाई चेन, महत्वपूर्ण खनिजों, AI, डेटा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर तेजी से बदलती वैश्विक राजनीति भी है। भारत का जोर ऐसी तकनीकी व्यवस्था पर है जिसमें तकनीक कुछ देशों की ताकत बढ़ाने का साधन बनने के बजाय विकासशील देशों के लिए भी अवसर पैदा करे।

