₹75,000 करोड़ में 126 राफेल फाइटर जेट; क्या थी मनमोहन सिंह सरकार की डील?

₹75,000 करोड़ में 126 राफेल फाइटर जेट; क्या थी मनमोहन सिंह सरकार की डील?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार भारत के सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी हथियार डील करने जा रही है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सरकार एयरफोर्स के लिए फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट की खरीद करने जा रही है. इस डील को लेकर मीडिया में तरह-तरह की बातें कहीं जा रही हैं. कहा यह भी जा रहा है कि राफेल एक बहुत महंगा फाइटर जेट है और इस खरीद पर भारत सरकार तकरीबन 3.25 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी. हालांकि अभी तक आधिकारिक तौर पर इस डील और इसकी कॉस्टिंग पर कुछ नहीं कहा गया है.

भारतीय एयरफोर्स इस वक्त लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही है. यह बात किसी से छिपी नहीं है. अभी तक सरकार और एयरफोर्स की योजना इस कमी को स्वदेसी फाइटर जेट्स से पूरा करने की थी. लेकिन, अमेरिकी कंपनी जीई की ओर से पैदा की जा रही अड़चनों के कारण देसी फाइटर जेट्स तेजस एमकेआई1ए और मार्क-2 में देरी पर देरी हो रही है. अब एयर फोर्स और इंतजार करने की स्थिति में नहीं है. चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन देशों से घिरे होने के कारण हम अब और इंतजार नहीं कर सकते. ऐसे में राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए सरकार दुनिया के एक सबसे बेहतरीन फाइटर जेट राफेल की खरीद पर आगे बढ़ रही है. इंडियन एयरफोर्स के पास पहले से ही राफेल के दो स्क्वाड्रन हैं. नौसेना के लिए भी 26 मरीन राफेल का ऑर्डर दिया जा चुका है. ऐसे में भारत ट्रायड और टेस्टेड फाइटर जेट राफेल की ओर ही बढ़ना चाहता है.

दरअसल, राफेल की खरीद की कहानी काफी पुरानी है. करीब दो दशक पहले 2007 में एयरफोर्स की भविष्य की जरूरत को देखते हुए और फाइटर जेट्स खरीदने की मांग उठी. उस वक्त देश में मनमोहन सिंह की सरकार थी. इसके लिए मीडियम मल्टी-रोल कम्बैट एयरक्राफ्ट (MMRCA) का टेंडर निकाला गया. इस टेंडर में दुनिया की तमाम फाइटर जेट कंपनियों ने हिस्सा लिया. फिर एयरफोर्स ने सभी फाइटर जेट्स का गहन परीक्षण किया. उसके बाद 2012 में राफेल ने यूरोपीय संघ के यूरोफाइटर टायफून फाइटर जेट को हराकर यह टेंडर जीत लिया. इस टेंडर में राफेल लोवेस्ट बिडर था. उस टेंडर के मुताबिक सरकार 126 फाइटर जेट्स खरीदने वाली थी. इसमें से 18 फाइटर जेट्स फ्रांस के दसॉल्ट एविएशन से फ्लाई-अवे कंडीशन में मिलने वाले थे. बाकी के 108 विमानों को टेक्नोलॉजी ट्रांस्फर एग्रीमेंट (टीओटी) के तहत भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के प्लांट में बनाया जाना था.
इस डील की संभावित कीमत ही सबसे अधिक चर्चा में रही. इसको लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया. लेकिन अनुमान लगाया गया कि यह डील 12 बिलियन डॉलर में होने वाली थी. 2014 के डॉलर-रुपया एक्सजेंच रेट करीब 62 रुपये था. ऐसे में यह डील करीब 75 हजार करोड़ रुपये की थी. मौजूदा वक्त में एक्सचेंज रेट 90 रुपये के करीब है. ऐसे में आज की तारीख में यह डील करीब एक लाख और आठ हजार करोड़ रुपये की होती. लेकिन, यह एक बारीक चीज यह है कि इस टेंडर से यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि यह कीमत केवल विमान के हैं या फिर उसमें लगने वाले हथियारों और मिसाइलों के दाम भी इसमें शामिल किए गए थे. इसमें विमान के रख-रखाव की लागत शामिल थी या नहीं, यह बात भी स्पष्ट नहीं थी.
टेंडर अलॉट होने के बावजूद यह डील कभी मूर्त रूप नहीं ले पाई. 2014 चुनाव का साल था और मनमोहन सरकार दसॉल्ट एविएशन की कई चिंताओं को दूर नहीं कर पाई. इसमें सबसे बड़ा मुद्दा मैन-ऑवर डिसक्रीपेंसी का था. मैन-ऑवर डिसक्रीपेंसी का मतलब कार्यकुशता से है. दसॉल्ट का कहना था कि फ्रांस में जो काम एक आदमी करते हैं वही काम एचएएल के प्लांट करने में उसे 2.7 लोग लगेंगे. उससे भारत में विमान बनाने पर उसकी लागत काफी बढ़ जाएगी. इसके अलावा उस वक्त के रक्षा मंत्री एके एंटनी ने विपक्ष की ओर से बिडिंग प्रक्रिया पर उठाए गए सवालों के कारण भी डील पर साइन करने में देरी की. इतने सब के बीच 2014 के मई में देश में नई सरकार आ गई और फिर 2015 में इस टेंडर को ही रद्द कर दिया गया. भारत ने फ्रांस के साथ सरकार से सरकार के स्तर पर डील कर 2016 में फ्लाई-अवे कंडीशन में 36 राफेल विमान खरीद लिया.
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