
“वो चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई… और एक खोया हुआ प्यार”
“वो चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई”
मीरा को लिखना बहुत पसंद था।
लेकिन अजीब बात ये थी कि
उसने सबसे ज़्यादा चिट्ठियाँ
उसे लिखीं
जिसे कभी भेज ही नहीं पाई।
समीर।
समीर उसके लिए कोई हीरो नहीं था।
ना ही कोई बड़े-बड़े वादे करने वाला इंसान।
वो बस हर सुबह उसी बस स्टॉप पर खड़ा होता था।
हाथ में टिफ़िन, आँखों में नींद,
और चेहरे पर एक ऐसी सादगी
जिससे मीरा को डर लगने लगा था—
कहीं उसे प्यार न हो जाए।
प्यार हुआ भी तो
बिल्कुल चुपचाप।
दोनों साथ बैठते,
कम बोलते,
पर ख़ामोशी बहुत कुछ कह देती।
एक दिन समीर ने कहा,
“अगर कभी मैं न रहा…
तो मुझे याद करोगी?”
मीरा हँस पड़ी।
“फालतू बातें मत किया करो।”
समीर मुस्कुराया,
पर उसकी आँखों में कुछ टूटा हुआ था।
उसके बाद समीर बस स्टॉप पर नहीं आया।
एक दिन।
फिर दूसरा।
फिर कभी नहीं।
मीरा को पता चला—
समीर को कैंसर था।
बहुत पहले से।
वो बस…
ज़िंदगी को सामान्य दिखाने की कोशिश कर रहा था।
अंतिम समय में
समीर ने किसी से मिलने से मना कर दिया।
सिर्फ़ एक डायरी छोड़ गया।
उस डायरी में
मीरा के लिए एक पन्ना था—
*“मीरा,
मैं तुम्हें वो वक़्त देना चाहता था
जो शायद मेरे पास था ही नहीं।
इसलिए कभी कुछ कहा नहीं।
अगर मैं कह देता
और फिर चला जाता,
तो तुम्हें दो बार दुख होता।
इसीलिए चुप रहा।
माफ़ करना
कि प्यार करके भी
निभा नहीं पाया।”*
मीरा ने उस दिन
अपनी सारी चिट्ठियाँ जला दीं।
पर आख़िरी वाली नहीं।
आज भी वो चिट्ठी
उसकी किताब में रखी है।
जिसमें सिर्फ़ एक लाइन लिखी है—
“कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में
हमेशा रहने नहीं आते,
वो बस ये सिखाने आते हैं
कि प्यार कितना ख़ामोश भी हो सकता है।”

