बांग्लादेश की राजनीति में महिलाओं की घटती भागीदारी, चुनावी मैदान से लगभग गायब हुईं महिला उम्मीदवार

बांग्लादेश की राजनीति में महिलाओं की घटती भागीदारी, चुनावी मैदान से लगभग गायब हुईं महिला उम्मीदवार

बांग्लादेश की राजनीति में कभी निर्णायक भूमिका निभाने वाली महिलाओं की भागीदारी अब तेजी से सिमटती नजर आ रही है। खालिदा जिया और शेख हसीना जैसे मजबूत महिला नेतृत्व के बावजूद मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य महिलाओं के लिए निराशाजनक होता जा रहा है। 12 फरवरी को होने वाले बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या बेहद कम है, जिसने देश में महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक समानता के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बांग्लादेशी मीडिया एजेंसी यूएनबी के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी समेत 30 से अधिक पंजीकृत राजनीतिक दलों ने इस चुनाव में एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारी है। चुनाव आयोग को सौंपे गए कुल 2,568 नामांकन पत्रों में केवल 109 महिलाओं ने अपना नामांकन दाखिल किया है। यानी कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 4.24 प्रतिशत रह गई है, जो अब तक के सबसे निचले स्तरों में से एक मानी जा रही है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की हालिया रिपोर्ट भी इस स्थिति को चिंताजनक बताती है। रिपोर्ट के अनुसार, आम चुनाव में भाग ले रही 51 राजनीतिक पार्टियों में से 30 ने किसी भी महिला को टिकट नहीं दिया। इतना ही नहीं, स्क्रूटनी प्रक्रिया के दौरान कई महिला उम्मीदवारों के नामांकन रद्द कर दिए गए। 37 निर्दलीय महिला उम्मीदवारों में से केवल 6 के नामांकन को वैध घोषित किया गया।

वैध उम्मीदवारों में सबीना यास्मीन, डॉ. तस्नीम जारा, मेहरजान आरा तालुकदार, अख्तर सुल्ताना, तहमीना जमान और रूमीन फरहाना जैसे नाम शामिल हैं, लेकिन इनकी संख्या राजनीतिक परिदृश्य में प्रभाव डालने के लिए बेहद सीमित मानी जा रही है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी गंभीर दिखाई देती है। जमात-ए-इस्लामी से 276, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश से 268, जातीय पार्टी से 224, गण अधिकार परिषद से 104 और बांग्लादेश खिलाफत मजलिस से 94 उम्मीदवार मैदान में हैं—लेकिन इन सभी दलों में एक भी महिला उम्मीदवार शामिल नहीं है। अन्य छोटी पार्टियों में भी, जहां प्रत्याशियों की संख्या 40 से कम है, वहां भी महिलाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है।

इस मुद्दे पर फोरम लीडर समीना यास्मीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “जब देश में 51 फीसदी वोटर महिलाएं हैं, तो उन्हें राजनीति से बाहर रखकर सत्ता हासिल करने की सोच पर सवाल उठना लाजिमी है। महिलाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, उन्हें संगठित करना और राजनीति में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना अब सबसे जरूरी काम है।”

महिलाओं, मानवाधिकार और विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले 71 संगठनों के साझा मंच सोशल रेजिस्टेंस कमेटी ने भी महिला उम्मीदवारों की कम संख्या पर गहरी चिंता जताई है। समिति का कहना है कि समाज में व्याप्त महिला-विरोधी सोच और पुरुष-प्रधान राजनीतिक संस्कृति के चलते महिलाएं, खासकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में, चुनाव लड़ने से कतराती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश की राजनीति में महिलाओं की घटती भागीदारी वहां के पुरुष-प्रधान राजनीतिक ढांचे, पितृसत्तात्मक सामाजिक सोच और सत्ता संरचना में पुरुषों के वर्चस्व को बनाए रखने की रणनीति का नतीजा है। यह स्थिति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि उस देश के लिए भी चिंता का विषय है, जिसने कभी महिला नेतृत्व के जरिए दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई थी।

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