बजट 2026 से मिडल क्लास की सबसे बड़ी चाहत, टैक्स पर ये काम हो जाए तो नाचने लगेंगे सैलरी पाने वाले

बजट 2026 से मिडल क्लास की सबसे बड़ी चाहत, टैक्स पर ये काम हो जाए तो नाचने लगेंगे सैलरी पाने वाले

 बजट 2026 आने में अब गिनती के दिन बचे हैं और इस बार चर्चा बड़े ऐलानों से ज्यादा रोजमर्रा की परेशानियों पर केंद्रित है. आम करदाता जानना चाहता है कि नया साल टैक्स के मामले में कितना फायदेमंद रहेगा. खास बात यह है कि 1 अप्रैल से नया आयकर कानून (New Income Tax Rule) लागू होने जा रहा है, जिससे नियमों में कई बदलाव देखने को मिलेंगे. लोग चाहते हैं कि अचानक नियम बदलने से उन्हें बार-बार परेशानी न उठानी पड़े.

नए कानून के तहत सबसे बड़ा बदलाव ‘टैक्स वर्ष’ प्रणाली को अपनाना है. अब तक आय कमाने का साल और टैक्स भरने का साल अलग-अलग माना जाता था, जिससे अक्सर भ्रम की स्थिति बनती थी. सुदित के पारेख एंड कंपनी एलएलपी की पार्टनर अनीता बसुर ने बताया कि अब जिस साल आय होगी, उसी साल उसकी रिपोर्टिंग और आकलन किया जाएगा, जिससे प्रक्रिया ज्यादा सरल और समझने योग्य बन सकती है.

ज्यादा कड़ा होने वाला है सिस्टम

हालांकि इसके साथ फॉर्म भरने की जिम्मेदारी भी बढ़ेगी. संशोधित रिटर्न फॉर्म में मकान किराया भत्ता, होम लोन का ब्याज और धारा 80सी व 80डी के तहत किए गए निवेशों की ज्यादा विस्तृत जानकारी देनी होगी. इन सभी आंकड़ों का मिलान एआईएस और फॉर्म 26एएस से किया जाएगा. अनीता बसुर के मुताबिक यह संकेत है कि टैक्स सिस्टम अब पूरी तरह डेटा आधारित और ज्यादा सख्त होने जा रहा है.

नौकरीपेशा वर्ग की उम्मीदें भले ही सीमित हों, लेकिन उनकी मांगें बिल्कुल साफ हैं. चार्टर्ड अकाउंटेंट साक्षी जैन का कहना है कि मध्यम वर्ग को प्रतीकात्मक बदलाव नहीं, बल्कि वास्तविक राहत चाहिए. उन्होंने स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ाने की जरूरत बताई और यह भी कहा कि होम लोन पर 2 लाख रुपये की ब्याज सीमा कई सालों से नहीं बदली है, जबकि प्रॉपर्टी के दाम तेजी से बढ़ चुके हैं.

साक्षी जैन ने कैपिटल गेन टैक्स को भी जटिल बताया. उनका मानना है कि होल्डिंग पीरियड और टैक्स दरों को सरल बनाया जाना चाहिए. इसके अलावा उन्होंने कई तरह के टीडीएस नियमों पर भी सवाल उठाए, खासकर तब जब कई लेन-देन पहले से जीएसटी के दायरे में आते हैं.
नए कानून को लेकर सिस्टम की तैयारी भी चिंता का विषय बनी हुई है. एक अन्य चार्टर्ड अकाउंटेंट ईशा जायसवाल ने बताया कि अपीलीय प्राधिकरणों के पास पहले से ही करीब साढ़े 5 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं. उनका कहना है कि असली समस्या कानून नहीं, बल्कि फॉर्म, फाइलिंग प्रक्रिया और दिशा-निर्देशों की स्पष्टता की कमी है. अगर समय रहते स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं मिला तो ईमानदार करदाता भी अनजाने में नियमों का उल्लंघन कर सकते हैं.

टैक्स स्लैब का दायरा व्यापक होना चाहिए

सिंघानिया एंड कंपनी की पार्टनर ऋतिका नैयर का मानना है कि मध्यम वर्ग को वास्तविक राहत तभी मिलेगी जब बेसिक छूट सीमा बढ़े, टैक्स स्लैब का दायरा व्यापक हो और स्टैंडर्ड डिडक्शन में इजाफा किया जाए. उन्होंने यह भी कहा कि नए टैक्स सिस्टम में कुछ जरूरी कटौतियों को फिर से शामिल किया जाना चाहिए ताकि बढ़ती महंगाई के दौर में लोगों की खर्च करने की क्षमता सुधर सके.
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