झारखंड में ‘शहर की सरकार’ पर सियासी खींचतान, गैर-दलगत चुनाव में भी झामुमो–कांग्रेस गठबंधन में दिखी दरार

झारखंड में ‘शहर की सरकार’ पर सियासी खींचतान, गैर-दलगत चुनाव में भी झामुमो–कांग्रेस गठबंधन में दिखी दरार

झारखंड में नगर निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। खास बात यह है कि चुनाव भले ही दलगत आधार पर नहीं हो रहे हों, लेकिन सत्ताधारी गठबंधन झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस के बीच सामंजस्य के बजाय राजनीतिक बिखराव के संकेत साफ दिखने लगे हैं। ‘शहर की सरकार’ बनाने को लेकर जिस एकजुटता की उम्मीद की जा रही थी, वह फिलहाल नजर नहीं आ रही।

नगर निकाय चुनाव को लेकर सभी दल अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की तैयारी में जुट गए हैं। ऐसे में माना जा रहा था कि विधानसभा और लोकसभा की तरह झामुमो और कांग्रेस यहां भी साझा रणनीति अपनाएंगे, लेकिन शुरुआती बयान गठबंधन की मजबूती पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

चुनाव घोषणा के बाद बदले सियासी तेवर

राज्य निर्वाचन आयुक्त अलका तिवारी द्वारा नगर निकाय चुनाव की घोषणा के बाद झामुमो के केंद्रीय महासचिव सह प्रवक्ता विनोद पांडे का बयान सियासी हलकों में चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने साफ कहा कि नगर निकाय चुनाव दलगत नहीं होते, इसलिए इस चुनाव में गठबंधन की कोई ठोस संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है। उनका कहना था कि पार्टी की प्राथमिकता यही होगी कि अधिक से अधिक झामुमो समर्थित उम्मीदवार चुनाव जीतें।

झामुमो के इस बयान को राजनीतिक जानकार गठबंधन से एक कदम पीछे हटने के संकेत के तौर पर देख रहे हैं। इसके बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या सत्ताधारी गठबंधन सिर्फ विधानसभा और लोकसभा तक ही सीमित रह गया है?

कांग्रेस भी दिखी अलग राह पर

झामुमो के रुख के बाद कांग्रेस भी फिलहाल गठबंधन को लेकर खास उत्साह में नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस प्रवक्ता सोनाल शांति ने कहा कि नगर निकाय चुनाव में गठबंधन की संभावना कम दिख रही है, हालांकि अंतिम फैसला पार्टी आलाकमान को लेना है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस समय मुख्यमंत्री राज्य से बाहर हैं और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिल्ली में हैं, ऐसे में इस मुद्दे पर आगे विचार-विमर्श हो सकता है। कांग्रेस के इस बयान से भी यह साफ है कि फिलहाल दोनों दल अपने-अपने स्तर पर चुनावी तैयारी में जुटे हुए हैं।

गैर-दलगत चुनाव, लेकिन पूरी तरह राजनीतिक

भले ही नगर निकाय चुनाव आधिकारिक तौर पर दलगत नहीं होते, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि हर उम्मीदवार किसी न किसी पार्टी के समर्थन से ही मैदान में उतरता है। यही वजह है कि यह चुनाव भी राजनीतिक ताकत के प्रदर्शन का बड़ा मंच बन गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि झामुमो और कांग्रेस अलग-अलग उम्मीदवार उतारते हैं, तो इसका सीधा फायदा विपक्षी दलों को मिल सकता है। वहीं, यह चुनाव भविष्य के विधानसभा चुनावों से पहले गठबंधन की सेहत का संकेतक भी माना जा रहा है।

आगे क्या?

फिलहाल तस्वीर यही है कि नगर निकाय चुनाव की घोषणा के साथ ही झारखंड की राजनीति में गठबंधन की गांठें ढीली पड़ती दिख रही हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ क्या झामुमो और कांग्रेस के बीच कोई साझा रणनीति बनती है या फिर दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरकर शहर की सत्ता की लड़ाई लड़ते हैं।

नगर निकाय चुनाव के नतीजे यह भी तय करेंगे कि ‘शहर की सरकार’ पर किसका प्रभाव रहेगा और सत्ताधारी गठबंधन की एकजुटता आने वाले समय में किस दिशा में जाती है।

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