
क्या अब थम गई सोने-चांदी की गिरावट? जिन्होंने महंगे में खरीद लिया, वो क्या करें? जानिए शरद कोहली से
पिछले कुछ दिनों में सोने और चांदी के दाम जिस तेजी से गिरे. इस गिरावट ने आम निवेशकों से लेकर बड़े खिलाड़ियों तक को चौंका दिया है. जो लोग कल तक रिकॉर्ड ऊंचाई की बातें कर रहे थे, आज वही असमंजस में हैं कि आगे क्या होगा? इसी माहौल में न्यूज 18 से बातचीत में अर्थशास्त्र के जानकार शरद कोहली ने इस गिरावट को लेकर जो विश्लेषण रखा, वह डर पैदा करने के बजाय तस्वीर को साफ करने वाला है. उनका कहना है कि बाजार में जो कुछ हुआ, वह अचानक जरूर है, लेकिन बेमतलब नहीं.
शरद कोहली के मुताबिक, हाल ही में सोना करीब 1,80,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास और चांदी 4,20,000 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच चुकी थी. इसके बाद एक ही झटके में सोने में करीब 1,000 डॉलर और चांदी में लगभग 40,000 रुपये तक की गिरावट देखी गई. कोहली इसे 1980 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट मानते हैं, लेकिन वे यह भी साफ करते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि अब अंतहीन गिरावट आएगी. उनके शब्दों में, “यह गिरावट असली मांग की नहीं, बल्कि सट्टेबाजी के गुब्बारे के फूटने जैसी है.”
कोहली किसी एक न्यूनतम स्तर की सीधी भविष्यवाणी नहीं करते, लेकिन संकेत जरूर देते हैं. उनका कहना है कि अगर मौजूदा स्तरों पर कीमतें कुछ दिन टिक जाती हैं, तो समझिए बाजार ने अपनी असली वैल्यू पकड़ ली है. इसके बाद धीरे-धीरे रिकवरी का रास्ता खुलेगा. यह रिकवरी एक हफ्ते या एक महीने में नहीं, बल्कि 2–3 महीने से लेकर 6 महीने का वक्त ले सकती है.
कोहली इस पूरी कहानी में डॉलर इंडेक्स की भूमिका बार-बार रेखांकित करते हैं. उनका कहना है कि डॉलर इंडेक्स जब 98 से फिसलकर 96 के करीब आया था, तभी सोने-चांदी में जोरदार उछाल दिखा. लेकिन जैसे ही अमेरिका में डॉलर को मजबूत दिखाने की कोशिशें शुरू हुईं, बाजार का रुख पलट गया. कोहली एक दिलचस्प तुलना करते हुए कहते हैं कि “डॉलर को मेकअप लगाकर मजबूत दिखाया जा सकता है, लेकिन वह ज्यादा देर टिकता नहीं.” उनके मुताबिक अगर डॉलर इंडेक्स 97–96 से नीचे जाता है, तो सोना-चांदी फिर से ऊपर की ओर बढ़ेंगे.
उन्होंने अमेरिका की नीतियों का जिक्र करते हुए बताया कि ट्रंप प्रशासन और फेडरल रिजर्व से जुड़ी चर्चाओं ने सट्टेबाजों में घबराहट पैदा की. जेरोम पॉवेल के बाद के नामों पर चल रही अटकलों और केविन वॉश जैसे मजबूत डॉलर समर्थकों की खबरों ने बाजार को सेलिंग साइज में धकेल दिया. इस बेचैनी का असर सीधे कॉमेक्स एक्सचेंज पर दिखा, जहां जनवरी के आखिरी दिनों में मंथली कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायरी के दौरान बड़े पैमाने पर कॉन्ट्रैक्ट काटे गए. कोहली बताते हैं कि पहले जहां कॉन्ट्रैक्ट रोलओवर हो रहे थे, वहीं अचानक बिकवाली शुरू हुई और डोमिनो इफेक्ट बन गया. चांदी में तो हालात ऐसे थे कि एक किलो के मुकाबले सैकड़ों सट्टे कॉन्ट्रैक्ट चल रहे थे, जो असली मांग से कहीं ज्यादा थे.
यहीं से पड़ सकती है स्थिरता की नींव
कोहली का मानना है कि अब इस गिरावट के बाद बाजार से सट्टेबाजी वाला हिस्सा काफी हद तक निकल चुका है और जो कीमत बची है, वही असली वैल्यू को दर्शाती है. यहीं से स्थिरता और फिर रिकवरी की नींव पड़ेगी. इस रिकवरी को मजबूती देने वाले फैक्टर के तौर पर वे जियोपॉलिटिकल तनावों का जिक्र करते हैं. ईरान और अमेरिका के बीच तल्ख बयानबाजी, रूस-यूक्रेन युद्ध की सख्त सर्दियों वाली तस्वीरें और पश्चिम एशिया में चल रही बातचीत – ये सभी स्थितियां सोने-चांदी को एक सुरक्षित निवेश बनाती हैं. कोहली याद दिलाते हैं कि पहले भी ऐसे “मूड इंडेक्स” और वैश्विक तनावों ने बाजार को ऊपर धकेला है.
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